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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



2-महसूसना


डॉ. प्रणव भारती


 

मेरे हथेलियों  में 
उग आए थे 
कुछ रंग-बिरंगे फूल 
कुछ सुगन्धित 
कुछ बिना किसी गंध के
बिना गंध के ?
चटककर प्रश्न उछला ---
हाँ,बिना गंध के भी  होते हैं--फूल 
वे ,अपना नाम -पता बताते हैं 
कुछ अपने तरीके से  
कैक्टस --जो लद  जाता है पूरा का पूरा 
ऐसे फूलों से ---जो गंध नहीं देते
मुस्कान जरूर खिला देते हैं चेहरों पर  
तुम ही तो कहते थे  
वे कुछ कहते जरूर हैं -----
बरसों पूर्व -- 
भोर में आँखें खोलते ही 
एक अजनबी गंध ने 
अहसास कराया था 
अपना बनाया था 
हौले-हौले वे बढ़ते गये थे 
मेरी नासिका की ओर 
आँखों की ओर 
साँसों  की ओर 
वे बढ़ते ही गए ----
क्रमश: 
भीतर पहुँच गए थे 
शायद --मन के ----
हाँ,मन खिलता है उन्हें देखकर 
मुरझाता  भी है 
जैसे --तुम बिन मैं
अपनी हथेली एकटक देखती
महसूस रही हूँ 
उन पलों को 
जब ये फूल उग  आए थे
मेरी हथेलियों में 
और मैं पूरी की पूरी 
अनुराग से नहा उठी थी ------||  

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