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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



1-महसूसना


डॉ. प्रणव भारती


 

अदृश्य सलवटों के बीच 
पसरी मासूम तन्हाई 
डंक मारती हुई 
ले चलती है भूत के कगार पर 
जहाँ तुम नहीं होते 
होती हैं केवल परछाईयाँ 
कुछ दाने मुह्ब्ब्तों के 
बिखरे रहते हैं 
सलवटों के बीच 
कुछ अनखिले गीत 
गुनगुन करते से 
पुकारने की चेष्टा में 
दम तोड़ते से प्रतीत होते हैं 
कुछ ऐसा भी होता है 
जैसे कोई फूल 
अचानक ही खिलना छोड़कर 
दुबक गया हो 
किसी कुहरे के अंधियारे 
आँचल में 
कुछ हलचल सी लगती तो है 
संभवत:कुछ कहती सी प्रतीत होती है 
किन्तु 
मेरे भीतर का मौन 
सुन नहीं पाता
अधखिले ,अधकचरे साँसों की 
उखड़ी तड़पन 
चारों ओर पसरी रहती है
और--- मैं 
साँसों का तंबूरा ढोए
थककर चूर हुई 
उन्हीं सलवटों के बीच 
आ पसरती हूँ 
और महसूस करने लगती हूँ 
उन मुहब्बतों के दानों को 
जो मेरी सूखी हथेली में 
आने को मचलते से लगते हैं || 

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