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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



मैं हारना नहीं चाहता


नरेश गुर्जर



मैं हारना नहीं चाहता,
जहाँ झूठ ही सच है और सच ही झूठ,
ऐसी दुनिया के सामने झूठ का वो मुखोटा कि मैं कमजोर नहीं हूँ,
मै उतारना नहीं चाहता,
चारों तरफ से घेरे बैठे है
मुझको दुनिया के विश्वासघात,
बहुत सी आँखें बहुत से कान बहुत सारे बेरहम हाथ
कब दिखू कमजोर उनको वो राह रहे ताक, 
कैसे कर दूँ अपने आप को उनके हवाले
मैं जीते जी खुद को मारना नहीं चाहता,
ये सच है कि मैं झूठ के सहारे खड़ा हूँ
पर क्या करूँ मैं हारना नहीं चाहता


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