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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



फूल और काॅटे


मोती प्रसाद साहू


स्वागत है उन काॅटों का भी
जो फूलों की रक्षा करते।
जो उनको मुरझाने आये
उसके हाथों में चुभते हैं।।

यदि काॅटे ही उगते जायें
तो केवल झाड़ी बनती है।
धरती भी अपमान झेलती
झाड़ी की तो जड़ खुदती है।।

फूल विहॅसता रहे वृंत पर
यह काॅटों की जिम्मेदारी।
नहीं शिथिलता नहीं संकुचन
ना संकट हो कोई भारी।।

फूल और काॅटे का मजहब
अलग अलग कैसे हो सकता।
एक शाख है मूल एक ही
कैसे रक्त विलग हो सकता।।

फिर छोड़ो नफरत की बातें
बनो एक दूजे का पूरक।
वृक्ष राष्ट््र है तुम दोनों का
पोषक योजक व संरक्षक।।

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