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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



मंजिल मिलेगी क्यों नहीं


कुलदीप पाण्डेय आजाद



सिर हार हो या जीत हो,
कोई नहीं भयभीत हो |
कर्तव्य पथ पर हम बढ़ें ,
संघर्ष यदि कम हो नहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||
जब लक्ष्य पर ही हो नजर ,
अविरत बढ़ें अपनी डगर |
जीवन समर हर जीत लें ,
विश्वास यदि कम हो नहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||
अविराम पथ पर बढ़ रहे ,
अवरोध विचलित कर रहे |
तूफान आते देख कर ,
भयभीत यदि हम हों नहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||
पथ कंटकों से हो भरा ,
चाहे दिखे उपवन हरा |
मौसम सुनहरा देख यदि ,
रुकते डगर में हम नहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||
मंजिल जिसे मिलती वही ,
क्या योजना करता सही ?
असफल हुआ राही कभी ,
यदि हौसला त्यागे नहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||
सपने बुने हैं जो सभी ,
न भाग्य पर छोड़ो कभी |
भाग्य मेहनत है अगर ,
यह मान कर चलते कहीं |
मंजिल मिलेगी क्यों नहीं ||

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