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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



देश मेरा बढ़ रहा


कुलदीप पाण्डेय आजाद



देश मेरा बढ़ रहा |
प्रगति सीढ़ी चढ़ रहा |
देश के उत्थान में सब,
साथ मिल अब चल रहे हैं |
खून से सींचा जिसे था ,
हर सुमन अब खिल रहे हैं |
कंटकों को आज देखो
स्वम ही वह जल रहा है |
देश मेरा बढ़ रहा |
गोद में बैठे अभी तक ,
थे वही अब चल पड़े हैं |
जो कभी विघटित मनुज थे ,
आज वे इकजुट खड़े हैं |
झांक देखो हर हृदय अब ,
एक भाषा पढ़ रहा है |
देश मेरा बढ़ रहा |
लाल वसुधा दिख रही ,
अब भी सुनहरे खून से |
निर्भय तभी उड़ते यहाँ ,
नभचर गगन को चूम के |
खून के हर एक कण से ,
वीर प्रतिक्षण पल रहा है |
देश मेरा बढ़ रहा |
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