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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



नमन


कंचन अपराजिता



हे वीणावादिनी 
तुम्हे नमन हैं
तुम प्रेरणा बनकर 
मेरे दिल मे रहा करो
तुम शब्द बनकर
मेरी लेखनी से बहा करो


हे श्वेतपद्मासना
तुम्हे नमन है
तुम्हारी स्निग्ध वस्त्र सा
मेरा हो मन
तेरी रूप की शीतलता
भावनाओं को करे कोमल


हे वीणापाणि  
तुम्हे नमन है
तुम वेद हो, पुराण हो
महाग्रंथ का आधार हो
तुम ज्ञान का भंडार हो
तुम सर्वज्ञ जीवनसार हो


हे कमलहासिनी
तुम्हे नमन है
वंदना करू तुमसे
तुम शक्तिपुँज बनकर
मुझको आलोकित कर जाओ,
अपनी आभा का बस एक कतरा दे जाओ।
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