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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



माया जाल


गीता धीमान



नारद का सपना
सुन्दरी को पाने का सपना,
बड़ी उमंग,
उल्लास बड़ा था ,
लेकिन रूप का भय था
प्रभु से जा चाह ,
अपनी सुनाई 
माँगा मनोहर ,
ऐसा रूप ,
जिसे देख रूपसी 
सीधे आए उस ओर 
वह बन जाये 
वरमाला का अधिकारी
तथास्तु सुन प्रभु मुख से   
दौड़ लगाई स्वयम्बर की ओर,
गर्व सहित जा बैठा,
राजसभा के बीच ,
उचक उचक स्वरूप दिखाता ,
लेकिन जीत न पाया ,
जो चाहा था ,
उपेक्षा व अपमान से आहत
बैठ गया इक नदिया के तीर ,
यह क्या !नजर पड़ी जब ,
निज मुख पर ,
बन्दर का चेहरा देखा |
पल में प्रभु की लीला को समझा ,
चित्र खिंचा मानस पटल पर,
न थी कोई सोने की नगरी ,
न स्वयम्बर न नारी 
यह तो था इक 
आडम्बर भारी |
ऐसा ही है खेल  
यह दुनिया 
जिसमें भ्रमित नर-नारी 
मायाा ,मोह ने सब को घेरा 
राजा हो या भिखारी 
इक पल का भरोसा नहीं
कब मिट जाए
मोहक दुनिया सारी |
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