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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



वो गुब्बारा


अशोक दर्द


 
    
जो खरीद दिया था मुझे
मेरी माँ ने बड़े चाव से
फूटते ही गुब्बारा .....
मैं सड़क पर लेट गया गुब्बारा
 मेले से घर आते- आते  रास्ते में ही
फूट गया था मेरा गुब्बारा
और की थी माँ से जिद्द
फिर वापिस मेले में जाकर
गुब्बारा खरीदने की     
मगर ......... 
माँ रास्ते से वापिस
मेले में नहीं जा पाई थी
क्योंकि तब तक
तय कर लिया था बहुत लंबा रास्ता
ठीक उसी तरह
जैसे बचपन से जवानी तक का रास्ता होता है
और पीछे नहीं मुड़ा जा सकता
सिर्फ देखा जा सकता है पीछे छोड़ा रास्ता
आज मैं ..........
खरीद सकता हूँ ढेरों गुब्बारे
मगर कहाँ से लाऊं वो मासूमियत
वो भोलापन वो रास्ता
मेले से माँ के कदमों तक का
वो मंजर प्यारा –प्यारा
वो माँ का दिया गुब्बारा ........||  

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