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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



मेरे पहाड़ में


अशोक दर्द


 
मेरे पहाड़  में उगते हैं आज भी प्रेम के फूल ,
और घासनियों पर उगती है सौहार्द की दूब ;
घाटियाँ गूंथती हैं छलछलाती
नदियों की मालाएं ;
धूडूबाबा की तरह नाचते झरने ,
गाते हैं रान्झु फुलमू ,कुंजू –चंचलो और सुन्नी –भून्कू के प्रेमगीत ,
यहाँ लोग दौड़ते नहीं ,
सिर्फ सीना ऊँचा कर चलते हैं ,
यहाँ आज भी घर ,
घर ही हैं ;
लोगों ने इन्हें मकानों में नहीं बदला है ;
मेरे पहाड़ में कोई लापता नहीं होता ,
दूर –दूर तक खबर रहती है उसके होने या न होने की ;
आज भी यहाँ कुछ अनछुए रास्ते हैं
जिन पर सिर्फ देवता ही विचरते हैं ,
किसान आज भी सज्जन –मित्र पछे-परौहने भिखु-भंगालु और
चिडुओं-पंखेरुओं के नाम
कुछ दाने अपने खेतों में ,
जरूर बीजते हैं
बूढ़ी  ताई ने परंपराओं की पोटली आज भी संभाल कर रखी है ,
आज भी सत्यम-शिवम-सुन्दरम का वास है मेरे पहाड़ में .....||

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