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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



एक गोश्त का टुकड़ा


वास्तुविद आशीष वैराग्यी


 

दिल कभी टूटता नही 
और नाही चटखने की कोई आवाज़ ही आती है।
ये तो बस एक गोश्त का टुकड़ा है
जो घुलता जाता है यादों के तेज़ाब में

बड़ी शिद्दत से गुजारता है रगों में खून
और खुद जर्रा जर्रा गलता जाता है
उसी लहूं में।

उस बेजान कली से उमड़ी उदासी 
उसके गमले को मायूस कर रही होगी
काश बचा लेता वो उसे तेज़ हवाओ से
वहीं कोने पे पड़ी है अबतक वो छोटी सूरजमुखी
कुम्हला जाता है दिल अक्सर
उस सूरजमुखी के फूल की तरह

याद है वो जूतियां जिन्हें संडे बाजार से लाया था
एक कागज का दिल चिपकाकर
सस्ता बोल के तुमने उमेठ दी थी उस दिल की सारी कोरें
औऱ उसी हील से कुचल दीया था तुमने,एक अहसास
तेरे आने के इंतज़ार में 
बाहर सीढ़ियों से सटी बैठी हैं वो जूतियाँ

दिल भी थोड़ा मसल दिया था तुमने उस दिन 
उस कागज़ की तरह, सारी कोरें ऐंठ गयी है

ये दिल है की हर हाल में जिंदा है 
मसल जाता है , कुचल जाता है,
कुमलाह जाता है, रौंद के चले जाते है लोग ,
औऱ हां!
झूठे वादों के नशतर तुम चुभो सकते हो दिल मे 

लेकिन तुम तोड़ नही सकते दिल 
कोई लोहा लाट है क्या?

दिल कभी टूटता ही नही 
और नाही चटखने की कोई आवाज़ ही आती है।
ये तो बस एक गोश्त का टुकड़ा है।
घुलता जाता है जर्रा जर्रा गलता जाता है।
 
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Origin: Number 5 of the
Robert Langdon Series
       

आपके अचेतन मन की शक्ति
        

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