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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



नारी


अर्विना गहलोत


 
नारी तू 
सुबह के अखबार सी 
लाख टुकड़ों में बटी ।
फिर भी पहले प्यार सी।
दोपहर की गुनगुनी धूप सी ।
ज़ज्बातों की बयार सी।
गमों के लेप सी तू।
अभावों की जेब सी ।
कभी फटने न देती ।
रिश्तों की सिलाई ।
करती तू हर दम तुरपाई।
शाम को दरवाजे पर खड़ी इंतजार सी।
चाय की भाप बन  ।
रिश्तों में लाती गरमाहट ।
सुनते ही पति के कदमों की आहट।
चेहरे  पे ला के मुस्कुराहट।
दिन भर की शिकन को हटा ।
करती नारी का फर्ज़ अदा।
शीतल चांदनी सी बिखरती रही।
हर गम की आंच सहती रही।
इसकी इतनी सी अदा । 
फर्ज की इतनी गाठें बांधी।
फिर भी कोई इस पर न हुआ फिदा।
पुरुष दंभ से लदा हुआ ।
नरी तू गई इस पर सब लुटा।
तेरा ऐहसास न इसको साले ।
तेने जाने कितने इसके गम संभाले ।
कहती निज मन की व्यथा।
सुनता न कोई देव यहां ।
 
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