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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



कायनात मुस्कुराई


अर्विना गहलोत


 	

ऐ भोर तुझको मेरा नमन।
सूरज की पहली किरण ।
उतरी मुड़ेर पर सुस्ता रही है।
मन में उठी तरंगों को ।
होले होले सहला रही है ।
सतरंगी चादर में लिपटी ।
पानी पे लहरा रही है ।
इन्द्रधनुषि रंगों में ।
हर रंग की कहानी अलग है ।
रंग हरा धरा धारण करे धरणी।
पियरी पहनें मुस्काई है ।
त्याग का रंग केसरिया।
काला बन बैठा रात की स्याही।
सफेद ने दुधिया चांदनी फैलाई।
गुलाबी ने फूलों पे मुस्कान बिखेरी ।
बैगनी तू क्यों चुप है भाई ।
लाल सूरज के गालों पे बिखरा ।
हमने तो इन्द्रधनुष से  सारे 
रंगो की किरणें चुराई ।
जिसे देखकर हसरत से ।
सारी कायनात मुस्कुराई ।
 
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