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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



मध्यांतर


अनुपम सक्सेना


 
                       

कहीं सूखी रोटी के भी लाले हैं 
तो कहीं छप्पन भोग स्वादिष्ट पकवान हैं 
मनोरंजन का मतलब सिर्फ क्रिकेट और सिनेमा है 
और कभी कभी शराब या फिर शबाब 
अब बहुत जरूरी है अमीर होना 
हिंदी के लेखक को 
अन्यथा अंधेरे से लडते लडते 
उसकी जान निकल जायेगी 
और यह कैसा पागलपन है 
कि अंधेरे सिनेमा हॉल में तीन घंटे विमूढ हो 
कभी रोते कभी तालियां बजाते बैठे रहना 
स्मार्ट जींस पहने लडकियों के हाथों में 
अंग्रेजी उपन्यास सुशोभित होता है
हिंदी साहित्य सिर्फ चंद बूढों का 
पराक्रम भर रह गया है
विचार लघुशंका की तरह बह रहे हैं
प्रतिभायें चौराहों पर पान खा रही हैं 
एक से बढ कर एक उस्ताद आ रहे हैं
जो मुस्कराते हुए आम आदमी को मार रहे हैं
और मारा जाने वाला भी खुश हो मर रहा है
यह कोई काव्यात्मक प्रतुति नहीं है
कोई शोक गीत भी नही है
सिर्फ मध्यांतर भर है 
आगे की फिल्म और भी खतरनाक है 
जिसमें भूखे मरते आदमी से कहा जायेगा- 
ए खुशनसीब ! 
तुम्हारे पास आंखें हैं, लीवर है और किडनी भी है.  
 

Indian Polity 5th Edition

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