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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



क्यों आती है!


डॉ० अनिल चड्डा


             
 
उस दिन 
मैं खूब रोया था
जिस दिन
तुझे खोया था
पर दिल में
तूने जो बीज बोया था
उसका अंकुर
तो फूटना ही था
किसी को तो 
उसे सींचना ही था
प्रस्फुटित प्रेम की
कलियों को होना ही था
पर
समझ नहीं आता
प्रेम का फला-फूला वृक्ष
आज तक
क्यों ऐसे फूल देता है
जिसमें तेरी मिली-जुली
सुगन्ध ही आती है
क्यों आती है!
क्यों आती है!!

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