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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



गरीबी की व्यथा


डॉ० अनिल चड्डा


             
 
झुग्गियों में जन्मी
कीचड़ में पली
फुटपाथ पर
थी मैं खेली
मेरा दर्द
और नग्नता
छुपाएँ थी
दीवारें खपरैली
या फिर
आकाश ही
जानता था
इनकी पहेली
तुमने क्यों
जगजाहिर 
कर दिया मुझे
क्या मिला तुम्हें
मेरी लुकी-छिपी
अस्मिता,
स्वाभिमान को
बेच कर
केवल 
कुछ अवार्ड
और
ढेर सारा पैसा
पर मैं तो
फिर भी
वहीँ की वहीँ हूँ
तुम्हारे अवार्ड
और पैसा तो
मुझे
ऊपर नहीं उठा सके
मैं तो
उसी अवस्था में
सिसकती
बिलखती
रोती ही रही
कल को
शायद फिर
कोई
दुनिया से
मेरा सौदा करेगा
और कुछ
वाह-वाही लूट लेगा
पर मैं तो
सड़क पर
फुटपाथ पर
किसी झुग्गी
या
कीचड़ में ही
लोट-पोट
होती रहूँगी
और
लुटती ही रहूँगी !
लुटती ही रहूँगी !!
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