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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



दिया


अमरेश सिंह भदोरिया


 
 
संघर्षों     में      जीवन    उसका
हरपल      ही     ढलता       रहा
दिया रात      में     जलता   रहा
दिया रात     में      जलता   रहा
1.
रोशनी      के     रोज़गार       में 
रोज़         सूखती             बाती
हल्की      हवा      के    झोंके से 
लौ        भी     हिलडुल    जाती
ख्वाब      अंधेरों    से  लड़ने का 
सपनों         में      पलता।   रहा
दिया      रात     में    जलता रहा
दिया      रात     में    जलता रहा
2.
काली-काली       रातों           के
किस्से                     काले-काले
अभाव       के        हिस्से       में
कब   आते        यहाँ       उजाले
समय      का     हर पाशा उसकी 
किस्मत      को        छलता  रहा
दिया      रात     में   जलता  रहा
दिया      रात     में   जलता  रहा
3.
चाँदनी      की     किरणें       भी
बस        मुंडेर       तक    आती
समता      के      आँगन   में वह
भेद          भाव            फैलाती
खोटी        बात    है  वर्गभेद तो 
ये    सिक्का     क्यों  चलता रहा
दिया     रात    में     जलता  रहा
दिया     रात    में     जलता  रहा
4.
अगर      हमारी     और   तुम्हारी 
होती        सोंच              सयानी
प्रेमचंद      फिर     कभी      नहीं
लिखते       गोदान          कहानी
बोतल रही        पुरानी "अमरेश"
लेबल     ही      बदलता       रहा
दिया      रात     में     जलता रहा
दिया      रात     में     जलता रहा
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