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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



दीपक


अमरेश सिंह भदोरिया


 

पुरुषार्थ के    स्वर्णिम  साँचे में
स्वाभिमान    जब     ढलता है।
तब दिनकर कहीं  निकलता है
तब दिनकर कहीं  निकलता है। 
1.
तिमिरपाश             मिटाने को
नया       सवेरा        लाने   को,
आत्मदान            का  तेवर ले
कर में            संघर्ष कलेवर ले,
जीने की        उत्कट चाह लिए
दीपक जब तिल-तिल जलता है।
2.
पाने     की   बात मिली न कहीं 
देने     की      सनातन रीत रही,
कर्मयोग       का       हो चिंतन 
प्राणोत्सर्ग         पर्व बने जीवन,
प्रज्ञा के प्रखर        पंथ पर जब
सिद्धान्त       स्वयं ही चलता  है।
3.
जीवन भर खुद को लुटाया क्या
खुद को    खोकर के पाया क्या,
जप तप    निष्ठा से शुभ साधन
आलोक        पर्व का आवाहन,
समाधिस्त      होकर "अमरेश"
मिलती श्रम  साध्य सफलता है।

 
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