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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



भगीरथ


अमरेश सिंह भदोरिया


 
हे
भगीरथ !
लौट आओ
पुनः पृथ्वी पर
आपकी ज़रूरत है।
सूख चुका है,
मनुष्य का अन्तःकरण,
दरक चुकी है भावों को
जन्म देने वाली  जमीन,
मुरझा रही हैं संवेदनाएं,
नही दिखता दूर-दूर तक
कहीं प्रेम का नवांकुर,
अब शेष बचा है यहाँ,
सिर्फ दूर तक फैला हुआ
रेगिस्तान!
नज़र नही आता कोई
भी नखलिस्तान!
जो आँखों को दे सके,
दो पल का सुकून,
गहरा संकट है,
समस्या विकट है।
आपको दोहराना होगा,
फिर वही संकल्प,
नही कोई विकल्प,
करनी होगी तपस्या,
लगानी होगी समाधि,
मनाना होगा,
ब्रह्मा जी को,
प्रसन्न करना होगा,
आशुतोष को,
तभी होगा 
तृषित मनोभूमि का
सिंचन,
एक प्रार्थना!
एक विनती!
एक निवेदन!
 
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