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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



मधुमास


प्राण शर्मा


                    
कलियों को बनते सुमन मधुमास में 
देखिये,कुदरत का फ़न मधुमास में 

ताज़ा कुछ ऐसा है तन मधुमास में 
पल में मिटती है थकन मधुमास में 

खुशबुएँ ही खुशबुएँ हैं हर तरफ 
क्यों न इतराये चमन मधुमास में 

धरती दुल्हन लगती है हर एक को 
दुल्हा लगता है गगन मधुमास में 

छेड़खानी करता है  हर फूल से 
कितना नटखट है पवन मधुमास में 

आया है तो साल भर यूँ ही रहे 
कितना अलबेला है मन मधुमास में 

क्यों न मोहे हर किसीको हर घड़ी 
` प्राण ` धरती की फबन मधुमास में 


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