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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



फिर कोई ....


नवीन मणि त्रिपाठी



फिर कोई हमसे हमारा  फ़लसफ़ा ले जाएगा ।
वह मुसाफ़िर आज कोई  मशवरा ले जाएगा ।।

तिश्नगी गर है तो  पी ले होश  मत  बाकी बचे ।
मैकदे से क्यूँ भला  शिकवा गिला ले जाएगा ।।

इक कफ़न के वास्ते आया था वो दुनियां में तब ।
क्या ख़बर थी वो कफ़न भी हादसा ले जाएगा ।।

ताक  में  बैठा है कोई आशिकी  से बच के रह ।
चैन  सारा  लूट  कर  फिर  बेवफा  ले जाएगा ।।

है  कोई   तिरछी  नजर  तेरे  सनम  के  वास्ते ।
वो  तेरे  अहले  चमन  से  रहनुमा  ले  जाएगा ।।

कर रहा दीदार वो हुस्नो अदा महफ़िल में अब ।
लग रहा है ज़ख्म का इक तजरिबा ले जाएगा ।।

मैंकदा  को   ढूढता   है  वह    सुकूँ  के  वास्ते ।
आज  साकी  से  कोई  मेरा पता  ले  जाएगा ।।

यह मुहब्बत का चमन है कर ले थोड़ी आशिकी ।
मौत  के  भी  बाद  वर्ना  तू  जफ़ा  ले  जाएगा ।।

शह्र  में  उस  कातिलाना  हुस्न  की  चर्चा  बहुत ।
अब मुझे मकतल तलक वो मनचला ले जाएगा ।।

काम कुछ कर ले भलाई का अभी  भी वक्त  है ।
एक दिन तू भी खुदा तक हर  खता ले जाएगा ।।
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