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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



सूखते ज़ख्म को हरा मत कर


डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’


     

सूखते ज़ख्म को हरा मत कर ,
देखकर मुझको यूँ हँसा मत कर |

बेवजह मुश्किलें खड़ी होंगी ,  
फ्रेम तस्वीर से बड़ा मत कर |

जोगियों का भला ठिकाना क्या ,
मेरे बारे में कुछ पता मत कर |

एक ही चोट ने है तोड़ दिया ,
वार दिल पर यूँ बारहा मत कर |

सिर्फ महसूस कर मुहब्बत को ,
कुछ न सुन और कुछ कहा मत कर |

कुछ तो रिश्ते का भरम रहने दे ,
क़र्ज़ दिल का अभी अदा मत कर |
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