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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



अच्छा नहीँ लगता!


धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


     

नज़ारा लाख दिलकश हो मगर अच्छा नहीँ लगता!
रखे जो दूर छाया को शज़र अच्छा नहीँ लगता!!

खुशी सारे ज़माने की भले मौजूद हो लेकिन!
भरा ग़म है अगर  दिल में  बशर अच्छा नहीँ लगता!!

रहे अभिमान में अकड़ा हमेशा जो  ज़माने में!
सिवा अपने कोई भी नामवर अच्छा नहीँ लगता!!

सियासत के दरिंदो की यही पहचान है होती!
बिना वोटों के कोई भी नगर अच्छा नहीं लगता!!

सदा आसान हों राहें नहीँ मुमकिन यहाँ हरगिज़!
गिले हों ज़िन्दगानी से सफर अच्छा नहीँ लगता!!
 
ज़माने को अगर देखो मुसाफ़िर की नज़र से तुम!
इरादों के बिना जीवन समर अच्छा नहीं लगता!
 

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