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वर्ष: 2, अंक 30, फरवरी(प्रथम), 2018



दोहे रमेश के, मकर संक्राँति पर


रमेश शर्मा


 

मकर राशि पर सूर्य जब, आ जाते है आज !
उत्तरायणी पर्व का,……हो जाता आगाज !!

घर्र-घर्र फिरकी फिरी, .उड़ने लगी पतंग !
कनकौओं की छिड़ गई,.आसमान मे जंग !!

कनकौओं की आपने,ऐसी भरी उड़ान !
आसमान मे हो गये ,पंछी लहू लुहान !!

अनुशासित हो कर लडें,लडनी हो जो जंग !
कहे डोर से आज फिर, उडती हुई पतंग !!

भारत देश विशाल है,अलग-अलग हैं प्रांत !
तभी मनें पोंगल कहीं, कहीं मकर संक्रांत !!

उनका मेरा साथ है,…जैसे डोर पतंग !
जीवन के आकाश मे,उडें हमेशा संग !!

त्योहारों में घुस गई, यहांँ कदाचित भ्राँति !
मनें एक ही रोज अब,नही मकर संक्राँति !!

जीवन में मिल कर रहो, सबसे सदा “रमेश” !
देता है संक्रांति का, …..पर्व यही सन्देश !!

तिल गुड़ की के लडडू मिलें, खाने को हर बार !
आता है संक्राँति का,......... जब पावन त्यौहार !!

तिल-गुड़ गज्जक रेवड़ी,सर्दी के पकवान !
खाएं जिनको  स्वाद ले , हर कोई इंसान !!

लेवें सब संक्रांति पर, आज यही संज्ञान !
तिल के लाडू से बड़ा, नहीं दूसरा  दान !! 

पोंगल  खिचड़ी लोहड़ी,तीनो  ही त्यौहार !
आते हैं संक्रांति के ,साथ साथ हर बार !!

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