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वर्ष: 2, अंक 30,  फरवरी(प्रथम), 2018



बालकहानी


विमला भंडारी


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बाल कहानी - मै हवा हूं दोस्तो, मुझसे मिलो- मैं पवन हूं। दुनिया में इकलौता हूं। मेरे कोई भाई बहन नहीं है। किसके साथ हंसूं या खेलूं? किसके साथ बाते करूं? हां, मैं प्रकृति का सहचर हूं। यानि प्रकृति के साथ-साथ चलता हूं। प्रकृति के साथ मेरे रंग ढ़ंग बदल जाते है। सैर करने की मेरी आदत पुरानी है। तभी तो मौसम के साथ जुड़ी मेरी अपनी कहानी है। लो तुम्हें भी सुनाता हूं कि कैसे-कैसे लोगों ने मुझे कब-कब, क्या-क्या कहा। सर्दी शुरू होते ही मैं निकल पड़ता हूं पहाड़ो की सैर करने। बर्फ से ढ़के बर्फीले पहाड़ों की सैर का आनंद ही कुछ और है। चारों ओर बिछी बर्फ की चादर पर लोट लगाना मुझे बहुत पसंद है। ऊंची चोटियों को छूना, गहरी घटियों से गुजरना, मेरे खेल है। बर्फ को गिरते देखने के लिए मैं वहां ठहरता हूं पर मौसम का मिजाज बदलते देर नहीं लगती। वह मुझे धकियाता है और मैं वहां से भागता हूं पठार और मैदानों की ओर। तब लोग सर्दी के मारे ठिठुरने लगते है। दांत किटकिटाते हुए कहने लगते है- लो आ गई शीत लहर। मेरे पवन से शीत लहर बनते ही लोगो की हड्डी़ कांपने लगती है। पशु-पक्षी मनुष्य सभी को कांटे की तरह चुभने लगता हूं। वे बचाव की कोशिश करते है। मनुष्य तो सिर, कान, गला, पैर और पूरा बदन ढ़क लेता है पर जानवरों की तो बन आती है। बिचारे दुबके पड़े रहते है कहीं भी सिर छिपा कर। मौसम बदलता है तो मैं यानि पवन भी उसके साथ चल पड़ता हूं। पेड़-पत्तों से खेलने के लिये मैं बाग-बगीचे और जंगलों में पहुंच जाता हूं। खेलते खेलते अपने साथ सूखे पत्तों को उड़ाने लगता हूं। जंगल में सांय-सांय का संगीत गूंजने लगता है। लोग कहते है- लो बजने लगा फागुनिया। सर्दी से ठिठुरे हुए पत्तों से खेलने में पवन को कितना मजा आ रहा है। लोग तब पवन को फागुन की बयार कहने लगते है। मैं चौंकता हूं। थोड़ा ही समझ पाता हूं। ठूंठ बने पेड़ो के बीच से मैं यानि पवन गुजरने लगता है। खोखले बांस से गुजरते हुए संगीत फूटने लगता है। लोग कहते है- लो बांसुरी के पंचम स्वर बजने लगे। मैं हैरान होता हूं पर मन ही मन खुश होता हूं- संगीत का माधुर्य पाकर। मौसम फिर बदलता है। गर्मी छाने लगती है। धरती तपने लगती है। पवन यानि मैं थिर-स्थिर हो जाता हूं। यानि ठहर जाता हूं परन्तु मैं हूं तो पवन ही। शांति से रह नहीं सकता तो गर्मी को साथ लेकर चल़ पड़ता हूं। लोग कहने लगते है- लो लू चलने लगी। मेरा भंयकर प्रकोप फैलता है तो लागे लू के थपेड़ो से बचने का उपाय करने लगते है। कुछ महीने के बाद यह उमस, गर्मा-गरमी का मौसम बदलने लगता है। बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते है। पानी से लकदक हुए बादल बरसने लगते है। मैं यानि पवन यह सब देख आनंदित हो जाता हैं। बादलों के संग आंख मिचौनी खेलते हुए वेग से बहने लगता हूं। अपने साथ धूल-मिट्टी को उड़ाने लगता हूं तो लोग कहते है- लो आंधी आ गई। आंधी के साथ कचरा धूल लिएअ ांखों में गिरने लगता हूं। घरों में घुसने लगता हूं। लोग दरवाजे खिड़की बंद कर देते है तो मैं जोर जोर से खिड़की दरवाजे खटखटाने लगता हूं। कोई द्वार नहीं खोलता तो मैं समुद्र की ओर बढ़ चलता हूं। समुद्र की लहरों के साथ खेलने लगता हूं। लोग कहते है- पवन लहरों के साथ अठखेलियां कर रहा है। लोगो के बालो और कपड़ों के साथ खेलने का आनंद लेता हूं। नाव चलाने वाला नाविक मेरा स्वागत करते पुकारने लगते है पुरवा सुहानी आई रे पुरवा। पवन से पुरवा बन जाना मुझे भी अच्छा लगता है। मेरी चंचल प्रकृति कभी कभी उदण्ड हो जाती है ओर मैं यानि पवन अपनी पूरी ताकत से लहरो को उछालता हूं तो तूफान आ जाता है। कभी-कभी इतनी तेजी से तूफान उठाता हूं कि जीवन संकट में पड़ जाता है। चारों ओर तबाही आ जाती है। तब मुझे बहुत भला बुरा कहा जाता है। मेरा मन टूट जाता है। मुझे भी मेरा कोई नाम पसंद नहीं आया। शीत लहर बनकर देख लिया। लोग बचते है मुझसे। फागुनिया बनने में भी वो मजा नहीं आया। लू के प्रकोप से तो सभी डर गये। आंधी को भी किसी ने अच्छा नहीं कहा। तूफान बनने के बाद तो मेरा रहा सहा सम्मान भी चला गया। पुरवाई और बयार बनकर मंद-मंद बहा तो लोग मुझे समीर कहने लगे। मैं हवा के रूप में ही ठीक हूं। सब आसानी से सांस लेते है। हवा वाली जगह देखकर बैठते हैं और मेरी सोहबत में घुटन से राहत पाते है। गहरी सांसं भरते है। प्राणायाम करते है। खुश होकर लोग तब मेरा स्वागत करते है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। चाहे वैज्ञानिक मुझे वायु कहते हो पर बच्चे तो अपनी फुटबॉल में हवा के रूप में ही मुझे भरवाते है। चाहे कार वाले बाबू हो या ट्रक वाले उस्ताद, स्कूटी वाली दीदी हो या बाईक वाले भैया वो लोग सब हवा ही भरवाते है। मेरे बिना उनका काम नहीं चलता। नन्हे-मुन्नों के खिलौनो में भी मुझे हवा के रूप में ही भरा जाता है। इतने नाम मुझे लोगो ने दिये जितने रूप मैंने धरे। मेरे मन को तो हवा रूप ही भाया पर लोगो ने मुझे अकेला देख गंदा कर दिया। मैं यानि पवन, हवा रूप में प्रदूषित हो गया तो सबका सांस लेना दूरभर हो गया। लोग मुझे अब न जाने क्या कहने लगे.....? नहीं .... नहीं कोई मुझे बचाओ... बचाओ इस प्रदूषण से। भेया दीदी मैं यानि पवन प्रदूषित नहीं होना चाहता। मुझे बचाओ।


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