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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

संस्कृति की माटी का तिलक

सतीश राठी

ललित निबंध के क्षेत्र में हमारे प्रदेश में वैसे तो कई नाम हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो सिरमौर नाम है, वह है श्री नर्मदा प्रसाद जी उपाध्याय का। वैसे तो उन्होंने लघु चित्र परंपरा एवं उसकी सौंदर्य दृष्टि, जैन दर्शन ,रामायण एवं गीत गोविंद का कला पक्ष, भारतीय साहित्य की सौंदर्य दृष्टि जैसे विभिन्न विषयों पर काम किया है, लेकिन ललित निबंध के क्षेत्र में उनका बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।उनकी ललित निबंध की तेरह कृतियां प्रकाशित हो चुकी है और राष्ट्रीय/ अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई सारे सम्मानों से वे सम्मानित भी हैं।

प्रस्तुत पुस्तक' चिनगारी की विरासत 'उनका सद्य प्रकाशित ललित निबंध संग्रह है, जिसमें उन्होंने शब्दों को संगीत की धारा की तरह प्रवाहित किया है । उन्होंने शब्दों को चित्रों की तरह किसी रंगीन कूची से विभिन्न रंग प्रदान किए हैं । जब पाठक इस शब्द सागर में गोता लगाता है, तो उसके हाथ में ढेर सारे रत्न और मोती आ जाते हैं। संग्रह की भूमिका से लेकर एक एक शब्द इतना महत्वपूर्ण है कि उनमें विस्तारित दर्शन पाठक को चिंतन के नए ढेर सारे बिंदु प्रदान कर देता है ।

'तुलसी का मन सूर सी आंखें 'पुस्तक का प्रथम ललित निबंध है। उन्होंने क्या खूब लिखा है," अधूरे पन की यही नियति है। हम अधूरा छोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं ,फिर नए सिरे से कुछ नया शुरू करते हैं, लेकिन वह भी अधूरा रह जाता है, और यह सिलसिला जीवन भर चलता है। लगता है यह अधूरापन ही जीवन की पूर्णता है। इसीलिए यदि पूर्ण समझ लो तो यात्रा विराम पा जाती है। पांव थक जाते हैं ।डगर आगे दिखाई नहीं देती। जहां कदम थक जाते हैं, वही मंजिल हो जाती है।"

इसी अधूरेपन से वह तुलसी और सूर के जीवन की पूर्णता तक का सफर इस निबंध में करते हैं। आसक्ति कामान्ध कर सकती है और जीवन को पूर्णता भी प्रदान कर सकती है। इसीलिए वह लिखते हैं कि,' तुलसी के मन से आसक्ति नहीं गई, उसका रूप बदल गया और अंधे सूर की निरंजनी आंखों में ऐसा अलौकिक प्रकाश समाया कि उनकी आंखों के कोटरों से सूरसागर की आलोक गंगा फूट पड़ी और भाषा का हर अक्षर सदैव के लिए उस अंधत्व का चिर ऋणी हो गया।'

राय प्रवीण पर उनका स्मृति आलेख शोध परक होने के साथ-साथ सारी किंवदंतीयोंऔर कथाओं को आंखों के सामने प्राणवान कर देता है। घुंघरू की ध्वनि से गुँथी पदचाप इस पूरे लेख में महसूस होती है ।प्रवीण राय का सौंदर्य और उसकी प्रतिभा का विशद वर्णन बड़ी ही रोचकता के साथ इस आलेख में किया गया है। अकबर के काल का पूरा चित्रण और किस तरह से अकबर को उन्होंने निरुत्तर किया था इसका पूरा विवरण इस लेख में है।

हम सबके मन की आस्था के राम का चित्रकूट उन्होंने शब्दों से जीवंत कर दिया है ।एक पूरा दृश्य रच दिया है और एक पूरे समय को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। चित्रकूट की सुंदरता अवर्णनीय है और उस सुंदरता को राम के साथ जोड़कर जो वर्णन किया गया है ,वह हमें हमारी इस धरोहर पर गर्वित करता है। राम लेखक के आस्था पुरुष है और राम के लोकजीवन ,उस समय के जनजातीय जीवन, संस्कृति ,कला और साहित्य में राम के अद्भुत वर्णन को एक विस्तृत आलेख के द्वारा उन्होंने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है।

लेखक के रचना कर्म को देखकर यह प्रतीत होता है कि उन्होंने राधिका के रसो वै स: के सूत्र को आपने श्वास-प्रश्वास के साथ अंतर्निहित किया है। इसीलिए ब्रज की रासलीला और परंपरा का चित्रण प्रभु के पूरे अंतर विग्रह की खूबसूरती के साथ प्रस्तुत कर देते हैं ।राम उनकी आस्था के पुरुष हैं तो कृष्ण उनके प्रेम के प्रतीक हैं। उपाध्याय जी इस प्रेम में समग्र डूबे हुए हैं ।नर्मदा के किनारे हरदा शहर से संस्कृति की माटी का तिलक लगाकर उपाध्याय जी ने जो सृजन किया है ,वह मनुष्य की संस्कारधानी के रूप में सामने आता है, और हमारी मनुष्यता पर आस्था को दृढ़ करता है।


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