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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

वो नन्हा

शबनम शर्मा

पहन के बस्ता, टाँग के बोतल, स्कूल की चमकीली वर्दी में, ठुमक-ठुमक कर वो पग भरता, आया घर से पहली बार, बहुत समझाया सबने उसको, जा रहा वो भी शाला आज, उतर गोद से पहन रहा वो, ज़िम्मेदारी का है ताज। जैसे ही स्कूल वो आया, हमने उसे कमरा दिखलाया, मैडम को था, हाथ थमाया, नन्हें ने फिर शोर मचाया। जोर से पकड़ा उसने मुझको, नहीं रहूँगा, मैं कभी यहाँ, ये सब तो घर में नहीं हैं जाऊँ हो मौज मस्ती जहाँ, उसके रुदन से, डब-डब आँखों से, मेरा मन भी था भर आया, छुड़ा कर हाथ, थमा शिक्षा के मन्दिर में, मैं छोड़ के आया।


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