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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

बूँद भर जल

डा0 अमिता तिवारी

आँख में ठहरा रहा अश्रू सम बहरा रहा विस्फरित हो तन गया बूँद भर जल बन गया कह दिया न कहना था जो न सहा वो सहना था जो था ही क्या जो कह गया मन बेमन हो रह गया एक ताला बनती चाबी प्रश्न- माला कितनी बांची कैसे झटका सह गया मोती -मोती कह गया कैसे -कैसे मन ने टाला मन ही ने लेकिन उछाला झरना सा सब झर गया बूँद भर जल रह गया


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