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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 67, अगस्त(द्वितीय), 2019

तेरे प्यार में हर सितम है गवारा

डी एम मिश्र

तेरे प्यार में हर सितम है गवारा होता है होने दो नुक्सां हमारा अभी तक सफ़र में था बिल्कुल अकेला मगर अब किसी ने मुझे भी पुकारा यही एक छोटी सी बस जुस्तजू है तुम्हीं फिर मिलो गर जनम हो दुबारा अगर तुम न होते तो मैं भी न होता कठिन जंग में भी कभी मैं न हारा मेरे पाँव कैसे फिसल सकते हैं जब तेरी बाँह का मिल गया हो सहारा प्रथम बार डर -डर के कैसे मिले थे नहीं भूलता है मुझे वो नजा़रा खुशी में किसी को भी साथी बना लो ग़मों का है रिश्ता हमारा तुम्हारा


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