Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक19, अगस्त(द्वितीय ), 2017



आँसू


डॉ. रानु मुंखर्जी


 		 
एकदिन अचानक मेरी सहेली का फोन आया
कि कल वह गई थी
हास्य कवि सम्मेलन में
जहाँ उसे बडा मजा आया ।
मजा इतना आया कि
हंसते हंसते आंखों में पानी भर आया
सुनकर तो मेरा सर चकराया
भुख के कारण आंखों का बहना
चोट लगने पर आंख भर आना
दर्द का सैलाब बन जाना
सुना था!
पर हंसते हंसते आंसू का बहना ?
सोचने पर याद आया एक “सबक”
कि आंखो के पानी में होता है “नमक”
जब दर्द में बहता है तो
लगता है पानी खारा और
जब हंसने पर बहता है तो
लगता है मिठा मिठा प्यारा प्यारा
तो जब भी आंसू बहाइए इसे चखिए
और चखकर जरुर बताइए कि
यह मिठा है या खारा
अगर मिठा है तो इसे खुब बहाइए
खुब बहाइए और जीवन क मजा लुटिए ।

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें