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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



वक़्त ने कहा


रोहिताश बैरवा


                         
वक़्त ने कहा अब कुछ पल दादी के किस्सों का स्वाद चखूँ।
वक़्त ने कहा अब दादा के शिकवे फटकारे और डाट सहूँ।
वक़्त ने कहा है मम्मी पापा के दुःख दर्द चुराने का।
वक़्त ने कहा अब पड़ोसी से मुस्कुराते रिश्ते निभाने का।
रिश्तों के गरमाहट पर कब ठंडी रूखी बर्फ जमी।
सोंधी-सोंधी मिट्टी में कब लौटेगी मेरी नमी।
जब पतंग जुड़ेगी भीतर के एहसासों से।
भीनी-भीनी खुशबू कब महकेगी इन श्वासों से।
कब आयेगा समझ हमें क्या जीवन का असली मतलब है।
खुशियों को आकार मिलेगा होंगे सपने अपने ।
कभी मिले कुछ वक़्त अगर तो ठहर के सोचना कुछ पल।
यूँही कटेगा वक़्त या कुछ बेहतर होगा अपना कल।
   

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