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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



दर्द


मनोज कुमार सिंह


दर्द के नाम से सहम जाना स्वभाविक है। यह दर्द मानव का हो या अन्य जीवों का होता तो है ही। मानव व अन्य जीवों का दर्द हम उनके व्यवहार या कार्य प्रणाली के आधार पर जान सकते हैं। दर्द कितना गहरा है यह तड़पने के आधार पर अंदाज लगाया जा सकता है। वैसे तो अन्य जीवों का दर्द भी मानव की तरह ही होता है, पर मानव के दर्द को समझने में थोड़ी सी आसानी हो जाती है। क्योंकि, उसके पास भावात्मक लगाव के साथ-साथ भाषा संप्रेषण भी है। भाषा के द्वारा हम दर्द की गहराई को आसानी से और जल्द समझ जाते हैं। वैसे तो हर दर्द की एक कहानी होती है। दर्द छोटा हो या बड़ा दर्द तो दर्द होता है। दर्द को कई रूपों में देखा जा सकता है। कुछ दर्द मरहम लगाने से, तो कुछ दवा खाने से, तो कुछ दर्द समय के साथ ठीक हो जाते हैं। परन्तु कुछ ऐसे दर्द होते हैं जो जीवन के अन्त होने के साथ ही शान्त होते हैं। कोई भी जीव या व्यक्ति दर्द नहीं चाहता पर क्या करे, यह दर्द ऐसा है कि, जाने अनजाने में हो ही जाता है। इस संसार में शायद ऐसा ही कोई व्यक्ति या जीव हो जिसे दर्द न हुआ हो। दर्द का स्वरूप जो भी हो पर हुआ जरूर होगा। हर चीज की एक उम्र होती है, वैसे ही दर्द की भी एक उम्र है। वह उसके स्वरूप और उपचार पर निर्भर करता है कि, वह कब तक रहेगा। पर कुछ दर्द ऐसे भी है, जिसका रंग समझ में नहीं आता और न ही उसके उम्र की। मैं जिस दर्द के बारे में कहना चहता हूँ उसको आपके समक्ष रखने का दुस्साहस कर रहा हूँ। परन्तु मुझे यह नहीं पता कि, इस दुस्साहस का स्वागत किस तरह होगा। जैसा कि हमने जिक्र किया है कि, दर्द की एक उम्र होती है और यह उम्र दो अर्थो में प्रदर्शित होती है, पहला की दर्द किस उम्र में प्रकट हुआ और दूसर वह कब तक बना रहा। इस लिहाज से दर्द की कोई उम्र नहीं की वह कब आ पड़े भले ही उसका स्वरूप जो भी हो। वैसे देखा जाये तो दर्द को सतही व आन्तरिक दो रूपों मे कहें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।

सतही दर्द प्रायः मूर्त होता है जिसे देखा जा सकता है। शरीर पर चोट लग जाना, शारीरिक व्याधि के कारण होने वाला दर्द। दूसरे की पीड़ा या दीन दुखियों की स्थिति को भी देख के मानव द्रवित हो जाता है और उसके हृदय से आह की आवाज आती है। यह भी दर्द की एक कोटि है। परन्तु ये सतही दर्द तो हमारी समझ में कम घातक है। यह कुछ दिन, महिने या वर्ष तक ही सीमित होते है। ऐसे दर्द की दवा व मरहम सामान्यतः मिल जाती है। कुछ दिनों में यह दर्द दूर हो जाता है या कोई विशेष फर्क नही होता। इस लिहाज से इस दर्द से सामान्यतः सभी बखूबी परिचित भी होगें जो कि आम तौर पर प्रत्येक मानव इससे गुजरा भी होगा।

आन्तरिक दर्द को देख नही सकते हैं। यह वही व्यक्ति महसूस कर सकता है जो उसका शिकार है। परन्तु आन्तरिक दर्द को अन्य व्यक्ति उसके कार्य व्यवहार व हावभव से जान सकतें हैं। जिस व्यक्ति का जितना करीबी सम्बन्ध होगा वह उसके दर्द को उतने ही आसानी से रू-बरू हो सकता है। पर इस दुनियाँ में ऐसे भी महान लोग हैं जो इस दर्द को बखूबी पी जातें हैं और उनके सबसे करीब का व्यक्ति भी ठीक से समझ नहीं पाता। ऐसे हजारों व लाखों में एक होंगे। यह आन्तरिक दर्द सामाजिक व व्यक्तिगत रूप से पनपे होते हैं।

सामाजिक रूप से पनपे हुये दर्द हमारे सामाजिक सम्बन्धों में आये हुए कमियों, खटास, सिकवा-शिकायत में उत्पन्न या तानों की रसा-कशी में उत्पन्न होते हैं। ऐसे दर्द में व्यक्ति जब भी मैका पाता है दूसरों की पुरानी बातों को याद कराकर इजहार करता है और जिस व्यक्ति को यह याद दिलाया जाता है वह उस दर्द का शिकार होता है। यह दर्द व्यक्ति समय के साथ भूल जाता है या भूलना चाहता है। परन्तु जब कभी ऐसे अवसर आते हैं यह सुसुप्त ज्वालामुखि की तरह जागृत हो जाता है और दिनों-दिन तक बना रहता है।

दूसरा आन्तरिक दर्द जो व्यक्तिगत रूप से पनपे होते हैं, जिसे व्यक्ति जाने अनजाने में लेता है। इस दर्द का स्वरूप कुछ इस तरह का होता है कि, व्यक्ति को यह धीरे-धीरे महसूस होता है। ऐसा दर्द बड़ा ही मधुर व मनमोहक होता है। आप सोचते होंगे कि यह दर्द कैसा है जो मधुर व मनमोहक है। तो मै बता देना चाहता हूँ कि यह दर्द प्रायः युवा अवस्था वाला दर्द ‘प्रेम का दर्द’ है। वैसे प्रेम तो व्यक्ति माता-पिता, भाई-बन्धु से भी करता है, जो बचपन से जीवन के अन्त तक बना रहता है। जिसके बिछड़ने का दर्द तो होता ही है, पर यह युवावस्था का प्रेम दर्द बड़ा ही कष्ट दायी होता है। चूँकि यह दर्द उस अवस्था की है जिस अवस्था में व्यक्ति बहुत कुछ कर गुजरने को आतुर होता है। यह प्रेम दर्द एक तरफा या दो तरफा हो सकता है। दो तरफा मतलब दोनों व्यक्ति, लड़का व लड़की और एक तरफा अर्थात् लड़का या लड़की। इस दर्द की कहानी बड़ी अजीब होती है, जिसको समझना और समझाना बड़ा कठीन है। यह दर्द हमारी समझ में सबसे खतरनाक व भयानक है। क्योकि, यह हर तरह के दर्द का एहसास कराता है। इस दर्द को कुछ सह नही पाते और कुछ सह लेतें हैं। ऐसे दर्द को जो सह नहीं पाते वह अपने आप को तरह-तरह की यातनाएँ, शारीरिक कष्ट देते हैं और दूसरे प्रेमी को डराते व धमकाते हैं। जिसे वह प्राप्त कर ले। यदि वह प्राप्त करने में असफल होता है तो, अपने आप को इस दुनियाँ से अलविदा करने का अनेक उपाय करता है। जिस उपाय में सफल हो गया वह दुनियाँ से अलविदा हो जाता है।

दूसरी ओर इस दर्द को जो सह लेता है वह दर्द सबसे कठीन होता है। जिस रूप में मानव को विश्व में सबसे श्रेष्ठ होने का गौरव प्राप्त है उसी तरह यह प्रेम का दूसरा दर्द ‘सहन करने वाला दर्द’ को मै मानू तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। हाला कि, इस दर्द पर बहुत से लोगों को आपत्ति हो सकती है, क्योकि, जब व्यक्ति को शारीरिक दर्द होता है तो उस समय सारे दर्द भूल जाता है। कई ऐसे हादसे होते है जिसमें व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है। जब मै इस सहन करने वाले दर्द को श्रेष्ठ व भयानक दर्द कहूं तो लोगों को अप्रत्यासित लग सकता है। इस दर्द को श्रेष्ठ व भयानक कहने के पीछे कुछ दलील दे सकता हूँ। मानव को श्रेष्ठ प्राणी इस लिए माना जाता है कि उसके पास भावात्मक लगाव के साथ-साथ मानवता है। अपनी बातों को कहने व सुनने के लिए भाषा है, दूसरे के दर्द को समझने के लिए संवेदना के साथ-साथ विवेक है। इसी के चलते मानव को श्रेष्ठ प्राणी कहा जाता है। यहीं मानव की श्रेष्ठता, सहन करने वाले दर्द में झलकता है।

यह तो बात हुई सहन करने वाले दर्द के श्रेष्ठ होने का। दूसरी बात आती है, भयानक व खतरनाक की। यह भयानक व खतरनाक कहने के पिछे तर्क यह है कि, यह दर्द असीम है जिसकी कोई सीमा नहीं। ऐसे दर्द व्यक्ति जीवन भर सहता है। हर पल हर क्षण हमसूस करता है। न जी पाता है न मर पाता है। बिछड़ने का दर्द उसकी जुड़ी हुई यादें होती है। चाहे काँलेज या विद्यालय का गप-शप हो, एक साथ मंदिर-मस्जिद में पूजा-अर्चन हो, मेले में हाथ पकड़ कर घूमने व झूला झूलने में हो, साथ में नाव पर बैठ कर उगते या ढ़लते सूरज को देखते हुए चिड़ियों को दाना डालते हुए सैर करना हो, पार्क में टहलना या बैठना हो, एक दूसरे के आँखों में आखें डाल कर प्रेम की गहराई में डूबना हो, एक-दूसरे के गोद में सोना हो या फिर प्रेमियों के कोमल हाथों का स्पर्श हो। यह और भी उदगार भरती है जब लड़का या लड़की को घर परिवार का प्यार दुलार न मिला हो। जब प्रेमियों को एक दूसरे का प्यार मिलता है तो कितना सुकून मिलता है। अब तो ज्यादातर लड़का या लड़की कैरियर के चक्कर में घर से बाहर ही रहते हैं। उसके उपरान्त इस अवस्था की विषम लिंगीय आकर्षण और भी चार चाँद लगा देता है। हर पल एक दूसरे के साथ बिताये हुए क्षण को याद करता है। जब वह साथ नही होता तो उसकी कमी खलती है और दर्द की भवर उठने लगती है। यह तो ऐसा है कि दिन तो दिन रात के सपनों में भी इर्द-गिर्द घूमता रहता है। ऐसे दर्द में व्यक्ति कभी निराश होता है तो कभी मुस्कुराता है। जब कभी ऐसे प्रेम का अवसर आता है वह सामने तो मुस्कुरा लेता है, पर पलक झपकते ही इतनी तकलीफ होती है कि आँसू आने से पहले ही सूख जाते हैं। ऐसे में यह दर्द सहने वाले पर क्या बितती है यह एक प्रेमी ही समझ सकता है। यह इतनी भयानक व खतरनाक होती है कि, उसकी दुनियाँ सिमट जाती है, लोगों से बातचित करना भूल जाता है। जो कभी एक छोटी सी मुलाकात में ये दुनियॉ खूबसूरत होती थी, वह विरान नजर आती है। सावन भी पतझड़ लगते हैं। भीड़ में भी अकेला महसूस करता है। उसका मन कहीं नहीं लगता। व्यक्ति एकान्तवासी हो जाता है और तो और वह दर्द की कराह से एक दूसरे की खुसी में अपने को भूल जातें है। यहाँ तक की अपनी मानसिक संतुलन भी खो देते है। इस सन्दर्भ में देखें तो यह खतरनाक व भयानक नही तो और क्या है? जिसमें व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। चूँकि मानव का अस्तित्व ही इस संसार का प्रतिनिधित्व करता है। यह मानव जन्म प्रकृति का अनुपम उपहार है। जब इसका अस्तित्व ही नहीं तो श्रेष्ठ मानव का मिथ्याभिमान काहे? खुदा न करे ऐसे दर्द से कोई रू-बरू हो।

हर दर्द की कुछ दवा होती है। कुछ दवा दर्द को ठीक कर देतें है पर कुछ दर्द, दवा से ठीक नही हो पाते। मानव होने के नाते मानवता यह कहती है कि, एक दूसरे के दर्द को मरहम लगाने की कोशिश तो कर सकते हैं। चूँकि दर्द देने वाले से दर्द पर मरहम लगाने वाला महान होता है। मरहम वही लगा सकता है जो फरिस्ता होता है। इसीलिए तो भौतिकतावादी समय में डाँक्टरों को भगवान की उपाधि देते हैं। माना कि भगवान को कोई देखा हो पर हमने नहीं देखा। लेकिन लोगों का विश्वास है कि, ईश्वर सब ठीक कर देगें। चूँकि यह दर्द प्रायः मिल ही जाती है इसमें कसूर नहीं पर दर्द को कम करने की उमीद से जहाँ तक हो सके मरहम हरदम लगाने की कोशिश तो कर सकते हैं । यह मानवता का सबसे बड़ा पूण्य का काम है। इसी आशा के साथ आपका दर्द महशूस करने वाला एक द्रवित ...........।


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