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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



सच्चा अधिकारी


मणि बेन द्विवेदी


‘’अरे माँ किधर हो ?

''का हुआ बिटवा काहे इतना तेजी में हो? आज बड़ा ख़ुश लागत हो।"

‘’हां माँ आज हम बहुत ख़ुश है.!"

"पर हुआ का?"

"अरे माँ अब तोहार बिटवा स्थायी लेक्चरार हुई गवा । लो माँ मिठाई खाओ और सगरे मुहल्ला में बांटो।" कहते हुए राहुल माँ को लडडू खिलाने लगा।

"हे भगवान् आज तो तूने हमरी सुन ली। बहुते मेहनत का पैसा था जो बचवा के नौकरी के लिए दिए रहें’’ !

''गहना गुरिया सब बेच दिहेन एकरे जिनगी बदे। हमका तो भरोसो भी नहीं था ऊ करत कि नाही? ज़माना बहुत ख़राब है बचवा। "

"का कहत हो माई ? ऊ नाही करत ...... सरवा का बोटी बोटी काट के न फेंक देइत पूरे दो लाख पचहत्तर हज़ार रूपया गिने रहेन माँ।"

"अच्छा माई ई ख़ुशख़बरी हम सबका बता के आवत हैं " इतना कहते हुए राहुल तेजी से घर के बाहर निकल गया।

अरे ये विनय के घर सन्नाटा,....

''का हुआ चाची'' ? किसी अनहोनी के भय से उसका दिल दहल गया।

"अरे का बताई बिटवा ये बार भी नौकरी में विनय का चयन नाही हुआ तो बबुआ हमार ज़हर पी लिहिस ऊ तो भगवाने बचा लिहिन नाही तो....... बोलते बोलते विनय की माँ फ़फ़क उठी। "

"का......"

राहुल के हांथ से लडडू का डिब्बा छूट गया राहुल अपराध बोध से भर गया।

''उठो विनय उठो चलो मेरे साथ'' राहुल विनय के क़रीब पहुँच उसे उठाने लगा

"पर कहाँ? "

''तुम चलो तो''

दोनों सीधे चयन अधिकारी के घर पहुंचे

"आओ राहुल आओ। "

"मुझे माफ़ कर दें सर''

"पर क्या हुआ??

"सर इस पद का सच्चा अधिकारी तो गोल्ड मेडलिस्ट विनय है मैं नहीं।"

भाव बिह्वल विनय सब कुछ समझने की कोशिश करने लगा।


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