Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



जड़


उत्तम टेकडीवाल


    
हवा के क्षीण झोंकों से ही गिर जाते हैं
जिनकी कमजोर होती हैं जड़ें।
जड़ें - जो दिखती नहीं हैं बाहर
फैली होती हैं अंदर ही अंदर
या उन गहराइयों को छूते हुए
उँचाईयाँ चढ़ने को ललकारते हुए
पूरे वजूद का पोषण करते हुए
अपनी मिट्टी से जोड़े रखती है हमें।

मिट्टी में जीवन के तत्व होते हैं
जिसमें बहता है अविरल अमृत रस 
मिश्रित है खून पसीना जिसमें
सँस्कारों का बदन बना है जिससे
सदियों से सँस्कृति को सम्भाले हुए
प्रदान करती है सुदृढ़ सबल नीव 
जडों के द्वारा सम्भलता बढ़ता है जीवन।

पल्लव पुष्प खिलते हैं डाल डाल 
अभिमानी क्यारियां छू लेती हैं आकाश
नये निराले ईन्द्रधनुषी रंगो से निर्मित
कितने मनभावन और अपने लगते हैं 
और दूर करते जाते हैं जड़ों से हमें
रिश्ते क्रमशः कमजोर होते जाते हैं
मिट्टी से, सँस्कृति से, सम्वेदनाओं से
वायु की तरलता में जड़ता खो जाती है।

मिट्टी की सुगंध नहीं भाती है अब हमें
शिराओं में रस नहीं खोखलापन बहता है
बेमानी और अर्थहीन बन जाता है जीवन 
वासनाओं की पराकाष्ठा पर पहुँच कर
जब फिर एक बार ढ़ूढ़ते हैं जड़ों को
बड़ा कमजोर और लाचार पाते हैं उसे
एक धरोहर का बोझ लिए
सभ्यताओं की जिम्मेदारी समेटे
रगों में कुछ बूँद अमृत संजोए
नई पीढ़ी के लिए धरती का दामन थामें
इन्तजार करती है उस बारिश का
जो पत्तों, तनों, शाखाओं को
फिर से भिगो कर, रस भर
मिट्टी से जोड़ दे जीवन
बुनियाद बने शिखर की वह सुदृढ़ जड़।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें