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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



बरसात


सुदर्शन वशिष्ठ


          
एक
रिमझिम बरसता हो पानी
या गिरती हो आटे सी महीन फुहार
घर की खिड़की से आंगन में उछलती
बूंदे देखंे
सूंघें भूनी मक्की की भीनी ख़ुश्बू
काले महीने में घर लौटी बहन से
सुनें सास की बातें
बचपन दोहराएं
हंसते हुए रोएं
रोते हुए हंसे
आओ बरसात देखें।
दो
खिड़की में बैठ
छत पर पड़ती टप टप सुनें
देखेे बापू के माथे की गहराती लकीरें
मां को रखते देखें जगह जगह
कटोरी गिलास तसला या बाल्टी
टपकती बूंदों तले
सुनें टपाकड़े का संगीत 
मां, जो डरती है बरसात में
टपाकड़े से
सिंह से नहीं डरती, शेर से नहीं डरती
भरता देखें खिड़की से
बापू की चिंताओं का पोखर
हम संगीत सुनंे
आओ बरसात देखें।
तीन
घनघोर घटाओं में
सहें बौछारों के बाण
कच्चे घर की भीगती कन्धे
भीगें, भीग कर सूखें
फिर भीगें
ऐसी भीगती रात में
जागते हुए सोए
सोते हुए जागें
आओ बरसात देखें।             
चार
इक पानी जो जीवन देता
इक पानी जो जीवन लेता
इक पानी गंगा में बहता
इक पानी है लाशें ढोता
इक पानी जो देव को चढ़ता
इक पानी है नाली में बहता
इक पानी जो मोती बनता
इक पानी है विष में मिलता
फिर भी पानी है पानी
पानी में पानी की पहचान नहीं है
जैसे आदमी में आदमी की पहचान नहीं है।
पांच
बूंद बूंद से रिसे घड़ा
बूंद बूंद चढ़े मंदिर
बूंद बूंद से बने दरिया
बूंद बंूद है जीवन
बूंद बूंद से भरे घड़ा
बूंद बूंद समंदर
छः
बरसाता है पानी अम्बर
नहीं देखता धरती की सीमा
रिस नही पाता जब धरती में
तब बहता है पानी
हो जाता तब पानी ही पानी
दुनिया बन जाती है फानी
कहां से आता इतना पानी
कहां को जाता इतना पानी।
सात
चलता हुआ संत
बहता हुआ पानी
कभी न मैला होवे
जो जागे सो पावे
जो सोए सो खोए।
आठ
कब बनता है पानी बादल
कब बादल पानी
यह तत जानें ज्ञानी
जल में कुम्भ है कुम्भ में जल है
बाहर भीतर पानी।
 

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