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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



उदासियों की छांव में


नरेश गुर्जर


 
उदासियों की छांव में 
मैने गुजारी है शामें,
सुबह की लालिमा सी 
महकती खुशियों को 
दोपहर की धूप में जलते देखा है, 
तेज आँधी से जैसे टूटकर गिरता है 
हराभरा दरखत कोई,
कुछ एेसे ही अपने आप को 
मैंने अंदर से टूटते देखा है,
एक कतरा पानी भी 
बुझा देता है यूं तो चिंगारी कोई
अपने जख्मों से रिस्ते हुए 
उस एक कतरे पानी को भी 
मैंने उबलते देखा है 		 
 

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