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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



राधा खड़ी सदी से


हरिहर झा


 
श्याम सलोने 
पलक बिछाऊँ, बसी मूरत न हटती। 

राधा खड़ी सदी से 
जाने पनघट पर, जल भरने 
जेल जनम कब लोगे मोहन, जग का संकट हरने

भोली बहना कैद, 
निर्दयी कंस की नहीं पटती। 

राधे मोहन 
एक रूप  हैं, कवि-वचनामृत तिरछे 
राधा-वेश में कृष्न आये, 
कृष्न किधर हैं पूछे
  
कान्हा बन कर 
राधा आई, ’राधे! राधे!’ रटती। 

छाछ के लिये नाचे कान्हा,  
भगत रसखान बोले    
रहीमदास 
गूढ़ रहस्य को, दो शब्दों में खोले 
  
गिरधर को 
कह दो  मुरलीधर, तो ना महिमा घटती। 
 

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