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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



कहाँ तक हटाएँ ....?


सुशील यादव


  
कहाँ तक छुपाएं ,किस किस से छुपाएं
फटी कमीज हो गई ,तार-तार जिंदगी
याचना में जब भी
हाथ ये उठाये
लोग हमें शातिर
चोर ही ठहराए

कहाँ तक बताये किस किस को बताये
पार पर ही डूबी , बार -बार जिंदगी

हौसलो की पतंग
जब से कटी है
राहगीरों ने डोर
आस्था लुटी है

कहाँ  तक मनाएं किस -किस को मनाएं
बची कहाँ है अब , सार -सार जिंदगी

पिछले कुछ दिन से
मन को हम झांकते
ईमान  की तुला में
कद- वजन नापते

कहाँ तक बचाये, किस -किस को बचाएं
चक्रव्यूह में घिरी ,धार-धार जिंदगी

कलयुग में होता
हमको  पछतावा
दुष्कर्मो का जब
फूटता है लावा

कहाँ तक हटाएँ, किस-किस को हटाएँ
ईंट-रोडे ये हैं बने ,द्वार-द्वार जिंदगी

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