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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



जीना मुहाल है


रवीन्द्र दास


                         
महबूब ही खामोश है, जीना मुहाल है
लगता है रकीबों की कोई ख़ास चाल है

वे कुछ कहें, तो आसमान गौर से सुने
जब हम कहें तो हर तरफ़ कैसा बवाल है

ज़ेरे-इताब आपका ओ जंग आपका,
जम्हूरियत में आपका कद बेमिसाल है

अल्लाह करे उनकी नज़र में हो बरक़त,
देखे कोई तो कहे वाह क्या कमाल है

अम्न दिलों में नहीं तो खाक हुकूमत
आशिकी के जोश में फिर भी उबाल है

देखो न उनकी ओर 'दास' हैं जो सरफिरे
आवाज़ सुनो दिल की जो कोई मलाल है
   

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