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वर्ष: 3, अंक 42, अगस्त(प्रथम) , 2018



चाऊमाऊ की कहानी मेरी ज़बानी


नीरजा द्विवेदी


आज जो कहानी मैं आप लोगों को सुनाने जा रही हूँ वह एक बहुत प्यारे, आज्ञाकारी पौमेरियन कुत्ते की है, जिसे हमने पाला था. एक दिन मेरे पति जब घर आये तो मुझसे बोले “अपनी आँखें बंद करो” और मेरे हाथ पर धीरे से एक फर जैसा मुलायम गोला रखकर आँखें खोलने को कहा. मेरी हथेली पर मुश्किल से ऊन के गोले के बराबर कद का एकदम सफेद पौमेरियन कुत्ते का पिल्ला रक्खा था. सफेद बाल, झबरी पूँछ, बडी-बडी गोल-कजरारी आँखों से वह मेरी ओर घूर रहा था और अपनी माँ को याद करके कूँ-कूँ करते हुए मेरे हाथ से मेरी गोद में घुसने का यत्न कर रहा था. मेरे दोनो पुत्र राजर्षि एवं देवर्षि उस समय बच्चे थे अतः एकदम से उल्लसित होकर उछल पडे. वे मेरे हाथ से उस ऊन के गोले जैसे गोल-मटोल पिल्ले को झपट कर ले गये. एक ने उसका नाम रक्खा चाऊ और दूसरे ने माऊ. नामकरण का फैसला हुआ तो पिल्ले का नाम चाऊमाऊ रख दिया गया. मैं चाऊमाऊ का पूरा ध्यान रखती थी. अपने हाथ से उसे दूध पिलाती और जब बडा हो गया तो दूध-रोटी खिलाती. जब मैं किसी कारण व्यस्त होती तो बच्चे अपने हाथ से उसे भोजन कराते थे. हम लोग चाऊमाऊ को बहुत प्यार करते थे. हमारी दृष्टि में प्यार करना अलग बात थी और स्वच्छता का ध्यान रखना अपनी जगह था. हम सभी लोग पिल्ले को जब भी छूते थे तब साबुन से अच्छी तरह हाथ धोना आवश्यक समझा जाता था. अन्य कुत्ते पालने वालों के समान हमारे इस प्यारे कुत्ते को बिस्तर पर साथ सुलाना तो दूर उसे हमारे शयन कक्ष में प्रवेश करने की भी अनुमति नहीं थी. बरामदे में दीवार के किनारे चार ईंटें रखकर उसके ऊपर एक बडा बक्सा रखकर चादर से ढँक दिया गया था और उसके नीचे चाऊमाऊ की गद्दी बिछा दी गई थी. गर्मी में उनके लिये पंखा चला दिया जाता था और सर्दी के दिनों में चाऊमाऊ अपना कोट पहनकर उस बक्स के नीचे रक्खी अपनी गद्दी पर विराजमान हो जाते थे. सबसे मनोरंजक दृश्य वह होता था जब कोई अजनबी व्यक्ति वहाँ पर आता था और चाऊमाऊ बक्स के नीचे से अदृश्य अवस्था में भौंककर उसका स्वागत करते थे. इसी क्रम में चाऊमाऊ का दूधवाले के स्वागत करने का तरीका बहुत अनोखा था. दूधवाला जब दूध लेकर अंदर आता तो वह बक्स के नीचे से शांतिपूर्वक बैठे देखते रहते थे पर जैसे ही वह दूध देकर अपने बर्तन को लेकर वापस जाने लगता तो चाऊमाऊ इतनी रौद्र मुद्रा में दाँत निकालकर उसे रपटाते कि लगता काट ही लेंगे. दूधवाला बिचारा चौंक पडता और डर से सरपट भाग जाता. चाऊमाऊ की एक आदत काबिलेतारीफ है कि वह किसी पर कितना भी क्रोधित होकर झपट पडते हों पर मजाल है किसी को एक भी दाँत या नाखून कभी लगा हो. वह केवल अपना दबदबा कायम करते थे.

सन 80 में हम लोगों को विदेश जाना पडा था. उस समय चाऊमाऊ को हम लोग चाची-पिताजी के पास मानीकोठी में छोड आये थे. उन दिनों बडे भाईसाहब कलकत्ता में थे और भाभी चाची के पास थीं. बरसात का महीना था. बिजली चमक रही थी. एक बरामदे में चाची और पिताजी सो रहे थे और दूसरे सामने के बरामदे में भाभी अपने बच्चों के साथ सो रही थीं. एक कोने में धीमी लालटेन जल रही थी . आंगन में मिट्टी का चूल्हा रक्खा था जिसके ऊपर शाम को भोजन पकाया जाता था. उसके समीप कुछ बिना जली लकडियाँ रक्खी थीं. वहीं पर एक स्टूल पर बाल्टी में ढँककर पीने का पानी रक्खा था. भाभी रात में पानी पीने के लिये उठीं तो चाऊमाऊ भौंकने लगा. भाभी ने कुछ देर मुडकर इधर-उधर देखा और जब कुछ समझ न आया कि क्या बात है तो पानी लेने के लिये चूल्हे की ओर चलने लगीं. जैसे ही भाभी ने पैर आगे बढाया कि चाऊमाऊ ने लपककर उनकी साडी पकड ली और उनको दूसरी ओर खींचना शुरू किया. पिताजी ने लालटेन की रोशनी तेज की और टौर्च जलाई तो देखते क्या हैं कि चूल्हे के पास रक्खी लकडियों में एक क्रेट नामक ज़हरीला साँप बैठा है. यदि चाऊमाऊ भाभी को पकडकर अलग न हटाता तो साँप उन्हें काट लेता. देहात में चिकित्सा सुविधा के अभाव में कुछ भी अनहोनी हो सकती थी.

बच्चों यह तो थी चाऊमाऊ की बहादुरी और समझदारी की कहानी. अब मैं तुम्हें चाऊमाऊ के संत स्वभाव की कहानी सुनाऊँगी. यह बात बरेली की है जहाँ मेरे पति की नियुक्ति उप महानिरीक्षक के पद पर थी. एक बार जंगल में आग लग गई और गांववालों ने एक हिरन के छोटे से बच्चे को आग से बचाया और लाकर मेरे पति को दिया. बच्चा इतना छोटा था कि उसे ठीक से दूध पीना भी नहीं आता था. एक दूध की बोतल मंगाकर उसे किसी तरह दूध पिलाया गया.. कुत्ते और हिरन की जानी दुश्मनी होती है. हमारे सामने अब यह समस्या थी कि हिरन के बच्चे को सुरक्षित कैसे रक्खा जाये? किसी तरह डरते हुए हम हिरन के बच्चे को चाऊमाऊ के पास ले गये कि उनकी मित्रता करा दी जाये. बच्चे को देखते ही चाऊमाऊ ने कान खडे किये और सतर्क होकर उसकी ओर बढने लगा. मेरी तो जान ही सूख गई जब मैंने देखा कि हिरन के बच्चे ने आव देखा न ताव और एकदम से दौडकर चाऊमाऊ के ऊपर ऐसे लुढक गया जैसे वह उसकी माँ हो. चाऊमाऊ ने भी उसे सूँघकर बच्चा जानकर अपने अंक में शरण दे दी. यह देखकर हम सबकी जान में जान आई.

हिरन के बच्चे का नाम हमने सारंगी रक्खा. देखते-देखते चाऊमाऊ और सारंगी की घनिष्ठ मित्रता हो गई. जब सारंगी कुछ बडी हुई तो हमने उसके सामने बरसीम ( घास ) का गट्ठा रखना शुरू किया. चाऊमाऊ भी सारंगी को बरसीम खाते देखकर उसकी देखादेखी कुछ बरसीम अपने पास उठा ले जाते और मुँह बना-बना कर खाने की कोशिश करते. उधर जब सारंगी देखती कि चाऊमाऊ को कटोरे में दूध-रोटी दी जा रही है तो सारंगी भी लपक कर चाऊमाऊ के कटोरे में मुँह मारने का प्रयास करती और चाऊमाऊ उसे क्रोध दिखाकर अपना भोजन न खाने के लिये चेतावनी देते. अब हमें एक कटोरे में सारंगी के लिये दूध-रोटी रखना पडता जिसे वह बेमन से खाने की कोशिश करती.

चाऊमाऊ और सारंगी की घनिष्ठता क्रमशः बढती जाती थी. अब दोनों साथ –साथ खेलते और लौन में उछल-कूद करते. खेल-खेल में जब दोनों एक दूसरे के गले में अगले पैर डालकर रौक एन रोल करते तो वह दृश्य बडा मनोरंजक होता था. जब मेरे पति का स्थानांतरण लखनऊ हुआ तो हमने सारंगी को ज़ू में भेज दिया.

लखनऊ में हम लोग बटलर पैलेस कौलोनी में रहते थे. वहाँ बरामदे में बक्स के नीचे चाऊमाऊ का बिस्तर लगाया गया था. एक बार की बात है कि मेरी तबियत खराब हो गई और न तो मैं दो–तीन दिन कमरे से बाहर आई, न ही चाऊमाऊ को अपने हाथ से खाना दिया. चाऊमाऊ को कमरे में अंदर आने की अनुमति नहीं थी. एक दिन मेरी आवाज़ सुनकर चाऊमाऊ अपने को रोक न सके और शयन कक्ष के दरवाज़े से अंदर घुसने लगे. इसी बीच किसी ने कहा- ‘ नो, चाऊमाऊ’ और यह सुनते ही चाऊमाऊ का बिना पीछे मुडे पूँछ की तरफ से बैक गियर लग गया. यह दृश्य इतना मार्मिक था कि मैं उठकर बाहर गई. मैंने चाऊमाऊ को प्यार किया और उसे बिना रोक-टोक के हाथ चाट-चाट कर स्नेह प्रदर्शन करने की अनुमति दे दी.

चाऊमाऊ का कद तो छोटा था परंतु बहादुरी में वह शेरदिल थे. जब वह हम लोगों के साथ शाम को टहलने निकलते तो उनकी वीरता देखने लायक होती थी. हमारे पास से आदमी तो क्या कोई बडे से बडा जीव भी गुज़र नहीं सकता था. कुत्ते,गाय, भैंस चाऊमाऊ की रौद्र मुद्रा से घबडा कर रास्ता छोड देते थे. एक बार एक बडे कुत्ते ने ताव में आकर उन्हें उनकी औकात दिखा दी. हुआ यह कि एक बडा कुत्ता जो रोज चाऊमाऊ को नज़रंदाज़ कर दिया करता था, एक दिन खराब मूड में था. जैसे ही हम लोग उसके समीप से निकलने लगे चाऊमाऊ ने अपनी आदत के अनुसार अपने कद से चार गुने कुत्ते पर भौंक कर झपटने की जुर्रत कर दी. अब क्या था उसने गुर्राकर चाऊमाऊ को पूँछ से पकड कर मुँह में ऊपर उठा लिया. मेरे पति ने चाऊमाऊ की चेन पकड कर खींची तो चाऊमाऊ बीच में लटक गये. गनीमत है कि उस बडे कुत्ते ने एक बार ही झटका दे कर चाऊमाऊ को छोड दिया और सबक सिखा दिया कि अकारण हेकडी नहीं दिखाना चाहिये.

चाऊमाऊ हमारे पास 12 वर्ष रहा. जब मेरे पति की इलाहाबाद में एडीशनल डी जी पुलिस हेडक्वार्टर के पद पर नियुक्ति थी तो अक्सर मुझे इनके साथ लखनऊ जाना पडता था. चाऊमाऊ का प्रबंध आवास के दफ्तर के सामने बरामदे में किया गया था और सर्दी में उसे गैलरी में कर दिया जाता था. हवलदार और टेलीफोन देखने वाले सिपाही वहां हर समय बने रहते थे. चाऊमाऊ को मैं जब इलाहाबाद में होती थी तो खाना अपने आप ही देती थी. एक बार जब हम लोग लखनऊ से लौटकर आये तो खाना देने के लिये चाऊमाऊ कहीं दिखाई नहीं दिया. बडी मुश्किल के बाद चपरासी ने डरते हुए चाऊमाऊ का अता-पता बताया. असल में चाऊमाऊ के सिर पर किसी की लापरवाही से सायकिल गिर गई थी और उसे सर में अंदरूनी चोट आ गई थी. भय वश चपरासी ने उसे दफ्तर में छिपा दिया था. मैं दौडकर चाऊमाऊ के समीप पहुँची तो उसकी दशा देखकर काँप उठी. चाऊमाऊ अपने बिस्तर पर मूर्छित सा पडा था. उसका सुबह का खाना अनछुआ पडा था. मेरी आहट सुनकर चाऊमाऊ ने धीरे से आँख खोलने का प्रयत्न किया. वह उठ नहीं पा रहा था. उसकी एक आँख अधखुली थी और मुझे देखते ही उसके नेत्रों से अश्रु प्रवाह प्रारम्भ हो गया. मैं भी अपने आँसू न रोक सकी. मैंने देखा कि उसका मुख भी नहीं खुल पा रहा है. मैंने एक गोली पैरासेटेमौल की पानी में घोलकर चम्मच से पिलाने की कोशिश की कि उसका दर्द कम हो जाये. मुझे मालूम था कि अंदरूनी चोट में आर्निका (होम्योपैथिक दवा) दी जाती है. मैंने कुछ गोलियां आर्निका की उसके मुँह में सरकाईं. चाऊमाऊ को डौक्टर को तो सुबह ही दिखाया जा सकता था अतः मैं रात भर चम्मच से उसे कभी पानी कभी दूध देने की कोशिश करती रही ताकि उसकी शक्ति बनी रहे. सुबह होने पर उसे भलीभाँति देखा गया तो यह जानकर तसल्ली हुई कि उसके शरीर में किसी तरह की टूट-फूट नहीँ हुई है. सिर में अंदरूनी चोट लगी थी. एक सप्ताह की सेवा-सुश्रूषा के बाद चाऊमाऊ कुछ चलने लगे और खाने लगे. पूर्णतः स्वस्थ होने में उसे एक माह लग गया. इस दुर्घटना के बाद चाऊमाऊ एक वर्ष स्वस्थ रहा.

अगस्त का महीना था. रात को भोजन के उपरांत हम लोग ए.डी.जी. आवास के अंदर के लौन में टहल रहे थे. चपरासी चाऊमाऊ को बाहर बाँधकर अपने घर जाना चाह रहा था कि चाऊमाऊ जंज़ीर छुडाकर भाग आये और हमारे साथ टहलने लगे. हमने देखा कि जब हम लौन में एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहलते हैं तो चाऊमाऊ थोडी दूर साथ जाकर बीच में बैठ जाता है. हम यह सोच कर हंसने लगे कि चाऊमाऊ आलसी हो गया है. चपरासी चाऊमाऊ को लेने आया तो वह गुर्राने लगा और साथ जाने को मना कर दिया. ऐसा प्रतीत हुआ कि वह किसी तरह हमसे अलग नहीं होना चाहता. इस आवास का अंदर का लौन अत्यंत सुंदर है और मेरा अधिकांश समय यहीं व्यतीत होता था. प्रकृति की अनेकों सुंदर कविताओं की प्रेरणा मुझे यहीं पर मिली थी. आज भी चंद्रमा की लुकाछुपी, घटाओं की उमड-घुमड, बिजली की तडकन, वृक्षों की हरीतिमा, शीतल पवन के झकोरे और लौन के सुंदर पुष्पों की मनमोहिनी छटा तो हमें आवास के अंदर जाने से रोक ही रही थी इस पर चाऊमाऊ का अद्वितीय स्नेह प्रदर्शन करने से भी हम अभिभूत होकर देर रात तक वहाँ कुर्सी पर बैठकर प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते रहे. चाऊमाऊ भी हमारे साथ बना रहा. प्रातःकाल इनको जल्दी उठना था अतः हमें बेमन से उठना पडा. चाऊमाऊ हमारा साथ नहीं छोडना चाहता था. मुझे क्या मालूम था कि यह चाऊमाऊ की अंतिम रात्रि है. उसकी वह कातर दृष्टि आज भी मेरे मानस को झंकृत कर जाती है. चाऊमाऊ के जाने पर कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं----- हृदय मेरा उदास हुआ है.

“प्राणों में पदचाप छिपी है,

क्यों मुझको भरमा जाते हो?

यहीं छिपे हो, आस-पास हो,

यह विश्वास जगा जाते हो.

हृदय तंत्री के तार न छेडो,

हृदय मेरा उदास हुआ है.

स्मृति के निर्जन प्रांगण में,

चुपके से तुम आ जाते हो.

यहीं खडे हो सम्मुख मेरे,

मन दर्पण दिखला जाते हो.

पलक झपकते गुम हो जाते,

हृदय मेरा उदास हुआ है.”


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