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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



"लज्ज़ा !"


ध्रुव सिंह एकलव्य


 		 
वो तोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 
वो मोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 

वो खोल रही है 
मन के द्वार 
वो जला रही 
करुणा ! अपनी 
वो छुपा रही 
पवित्र ! शरीर 
फटे से 
चीथड़े ! कपड़ों में 
वे झाँक रहें हैं 
नोंचने को 
मन पापी 
कर !
प्रबल शरीर 

वो बेच रही है 
जीने को !
शरीर नही है 
मन के पीर 
वो लगा रही है 
भरने को 
उदर है,ऊपर 
कदम ज़मीर !
कुछ नोंच रहें हैं 
देकर के
रोटी आशा !
घाव गंभीर 

वो तोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 
वो मोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 

पाले अपने बच्चों को 
स्वयं अस्मिता 
उनके तीर 
वे उड़ा रहें !
खिल्ली इसकी 
ये दबा रही
इच्छा अपनी  
वे कुचल रहें !
अरमानों को 
ये खीझ रही 
शमशानों में 
वो माँग रही 
मृत्यु ! अपनी 
वे दिखा रहें हैं 
जीवन को !

वो तोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 
वो मोल रही 
लज्ज़ा ! अपनी 

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