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वर्ष: 2, अंक 35,  अप्रैल(द्वितीय) , 2018



हाय मैने उपवास रखा


सुदर्शन कुमार सोनी


खाकसार अपनी निजी पत्नि को कई सालों से उपवास रखते देख रहा है , सच में भारतीय नारी बेचारी पति बच्चों की सही सलामती के लिये न जाने कितनी सदियांे से उपवास रख रही है। पति देश मे वास कर रहा हो या विदेश में हरी भरी वादियों मे किसी और की बांहो मे वास कर रहा हो तिस पर भी वह उपवास नही तोड़ती है ! पत्नि भांति भांति के उपवास कभी संतान के लिये , तो कभी पति की दीर्घायु के लिये , तो कभी ग्रह शांति के लिये तो कभी किसी मनोकामना के पूर्ण करने के लिये रखती है।

पत्नि को जब मैं ’करवा चैथ’ का चैबीस घंटे का निर्जला उपवास करते देखता हूं तो दिल दहल जाता है कि ये कैसे होता है ? पूछता हूँ तो वो कहती है कि बस हो जाता है ! इसी तरह नवरात्रि मे नौ दिन का उपवास बाप रे बाप ! और हम पति कंहा जंहा एक घंटे भी बिना कुछ खाये पिये नही रह सकते हैं वहां ये पत्निं रूपी नारियां चैबीस घंटे बेचारियां निर्जला रहती हैं। आष्चर्य कि एैसे समय भी वे पति व बच्चांे का ध्यान रखने में कोई कसर बाकी नही रखतीं हैं । जबकि पति व बच्चे एैसे दिनांे मे भी कोई नरमताई नही बरतते है , बल्कि एैसे समय तो इनकी जीभ और ज्यादा लपलपाती है । पत्नि भले ही इनकी यह संवेदनहीनता व ज्यादती देखकर मन ही मन कुढ़ती हो , परंतु वाह रे भारतीय नारी उफ तक नही करती है । वैसे एक बात तो है कि व्रत करके वह और निखर जाती है !

हमने कई अन्य महिलाओं को भी एैसे ही कई दशकों से उपवास करते देखा है कि उनके पति असमय टे न बोल सही सलामत रहें !

महिला सशक्तिकरण का प्रभाव कहें या हमारे अंदर की एक प्रतिशत भलाई कहंे कि हमने विनिश्चय किया कि हम भी उपवास रखेंगे। अब प्रश्न उठा कि कौन सा उपवास रहें ? इस संबंध मे हमने पत्नि की भी सलाह लेनी चाही । उनके बोलने के पहले ही हम बोल उठे कि हम तो ’करवा चैथ’ या नवरात्रि की टक्कर का कोई उपवास रखेंगे ! तुमसे इस मामले मे किसी भी तरह कमतर नही रहेंगे ? हमारा इतना कहना था कि पत्नि बहुत देर तक वैसे ही हंसती रही संभवतः यह सोचकर जैसे कि कोई स्कूल स्तर का खिलाडी़ सीधे ही ओलंपिक मे भाग लेने की ख्वाहिश प्रकट कर रहा हो ! पत्नि ने खिल्ली उडा़ते हुये हमारे उपवास रूपी ख्याली विकेट की एकबारगी तो गिल्ली उडा़ दी । कहा कि तुम्हारे वश का यह सब नही है ? मैने सोचा कि मेरे वश मे तो तुम भी नही हो ? उसने आगे कहा कि अच्छे से सोच लो तुम उपवास रहो तो मेरे लिये काम न बढे़। वैसे मैं फिर सलाह देती हूं कि तुम व्रत मत रहो यह तुम्हारे जैसे लोगों के डोमेन की चीज नही है ? मैने कहा कि तुम्ही ने तो एक बार चैलेंज किया था कि हम महिलाओं की तरह उपवास रहना पडे़ तो तुम्हारे जैसे पुरूषांे की अक्ल ठिकाने पर आ जायेगी ? वैसे यह कहते हुये मैने सोचा कि ठिकाने पर ही तो वह हमेशा से रही है , तभी तो तुम्हारा पल्लू यह लल्लू बार बार सोचने के बाद भी छोड नही पाता है !

अंततः मेरी जिद के कारण बीच का रास्ता चुना गया कि मैं कोई छोटा मोटा व्रत रहंू , जिसमे एक टाईम कम से कम पूरी खुराक मिल जाये और एक समय फलाहारी मिलेगा । मुझे लगा कि यह तो बहुत आसान होगा । मैने साप्ताहिक रूप से एक समय के उपवास पर रहना शुरू कर दिया ! पहले हफ्ते ही हमे समझ मे आ गया कि एक समय उपवास रहना भी इतना आसान नही है जितना कि हम समझते थे । सुबह मिलने वाले गर्मागर्म नाश्ते से जब हाथ धोना पडा़, तो मुझे लगा कि मेरी जान मारी जा रही है । इस समय ही मुझे भान हुआ कि मेरे लिये मेरी जान खाना है , और दूसरा कुछ भी नही! सुबह कंहा जंहा जो मर्जी वह मैं डकारता था । अब निरीह होकर पत्नि को पुकारता था कि यह क्या केवल दूध व फल के रूप मंे गुजारा भत्ता मिल रहा है। इससे तो भूख की तीव्रता का गा्रफ और तेजी से बढ़ जाता है ? इसके अलावा दफ्तर मे जब देर हो जाती है तो भूख क्या होती है , यह समझ मे आता है। ’भूख’ नाम की मूवी के दृश्यों रूपी लहरें भी यादों के समुद्री पेट मे निंरतर प्रहार करती हैं । पत्नि तो छोडो़ बरसों पहले दुनियां छोड़़ गयी नानी तक याद आ जाती है ।

जैसे तैसे हमने चार हफ्ते में चार बार उपवास के वार झेले। हां , अंदर की बात बता रहा हूं कि ये अब वार ही लगते थे , लेकिन चूंकि बात प्रण की थी तो ’पा्रण जाये पर उपवास न छोडा़ जाये’ के सिंद्वात पर हम अडे़ रहे। वैसे पत्नि ने इतने बरस बाद भी तरस खाकर , कई बार कहा कि मान भी जाओ ये जिद छोड़ दो ? राजनीति की ममता बनर्जी मत बनो कि जिद की तो फिर पूरी करके ही मानेंगे। पत्नि जब जब यह कहती तो हमारा स्वाभिमान और जाग जाता कि चाहे कुछ भी हो जाये उपवास तो अब हम नही त्यागने वाले। एक बार तो भूख बर्दाश्त न होने से ग्लूकोस चढा़ने की नौबत आ गयी , लेकिन हमने डाक्टर को कुछ और ही कारण बता अपनी भद होने से अपने आपको बचाया ।

खैर जिद मे ही सही हम उपवास आज भी जारी रखे हुये हैं , लेकिन हर सप्ताह एक दिन पहले से हालत खराब होने लगती है । यह सोच कर कि एक समय ही खाकर रहना पडे़गा । यह सबसे ज्यादा तब अखरता है जब सारी महत्वपूर्ण मीटिंग कार्यशाला , सेमीनार , कान्फ्रेंस इसी उपवास के दिन पड़ती हैं। जब कोई यहां पूछ बैठता है कि आप क्यों कुछ भी नही ले रहे है ? तो हम बडे़ गर्व से कहते है कि आज उपवास है , लेकिन साथ ही मीनू देखकर लगता है कि ये कितने भाग्यशाली है, और मैं कितना बदनसीब इतने पकवान सामने होने के बावजूद भुकवा रहने को मजबूर हूं । ’अभिशप्त’ शब्द उपयोग नही कर रहा हूं क्योकि यह निर्णय आखिर था तो मेरा ही !

हां ! अभी भी कभी कभी पत्नि चुनौती देती है कि नवरात्रि का नौ दिन का या करवाचैथ का निर्जला व्रत रख बताओ तो जानें ! मैं इस समय सोचता हूं कि एक दिन ये चैलेंज भी स्वीकार कर के बता दूं कि मैं भी किस मिटटी का बना हूं बस उस दिन का मैं भी इंतजार कर रहा हूं जब मैं यह हिम्मत कर पाऊंगा !

गंगू तो यही कहेगा कि यदि आप उपवास पर रहना चाहते है तो बेशक रहंे। लेकिन पत्नि की इस संबंध मे सलाह को शक की नजरों से न देखें । उसने न इसीलिये कहा होगा कि आपको दिन मे ही तारे उपवास रहने से नजर न आने लगें । गंगू तो इस अनुभव के बाद एक सोलह आने सच वाली सलाह देता है कि पुरूश व स़्त्री भगवान के बनाये दो कोहिनूर है ! दोनांे एक दूसरे से अपने अपने क्षेत्र में कंही से कम नही हैं। दोनो की कुछ कमजोरियां व कुछ ताकतें है इसे उन्हे समझदारी से स्वीकार करना चाहिये और बेकार की प्रतिस्र्पधा में नही पड़ना चाहिये। आज के समय की सारी झंझटे इस बिना दिमाग की प्रतिस्र्पधा के कारण ही सामने आ रही है ?


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