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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



रुबाइयां


नरेंद्र श्रीवास्तव


 
भटकते राही के लिये  राह  है ये ज़िंदगी।
बदनसीब दिल के लिये चाह है ये ज़िंदगी।
सज़ा मिले तड़पते रहने की 'नरेन्द्र' जिसे,
उस मोहब्बत के लिये गुनाह है ये ज़िंदगी।।
                   ***
गम से लबालब भरी प्याली है ये ज़िंदगी।
अँधेरे ने ही अब तक पाली है ये ज़िंदगी।
दूर तक निगाहों पार निशां कोई नहीं'नरेन्द्र',
ज़िंदगी और मौत बीच खाली है ये ज़िंदगी।।
                   ***
राह  में  पड़ी  धूल  भी  है ये ज़िंदगी।
माथे  पे  चढ़ी  फूल भी है ये ज़िंदगी।
मिलते  रहे गम जिन्हें उम्र भर 'नरेन्द्र'
तक़दीर में गड़ी शूल भी है ये ज़िंदगी।।
                  ***
मिल गया सब कुछ तो भगवान है ये ज़िंदगी।
मिल गया  गर  कुछ  तो इंसान है ये ज़िंदगी।
'नरेन्द्र' आत्मा तो एक है रूप ही अनेक हैं,
मिला नहीं कुछ भी तो शैतान है ये ज़िंदगी।।
                   
  

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