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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मुहब्बत के मायने


डॉ० अनिल चड्डा


मुहब्बत के मायने समझ नहीं आते,
वो गुजरे जमाने समझ नहीं आते।

लोग मयखाने जाते हैं ग़म को भुलाने,
जाम खुशी में पिलाने समझ नहीं आते।

वो तो शर्मसार होता न अपने कर्म पे,
उसके बेशर्म बहाने समझ नहीं आते।

बात कितनी भी कर लो, न समझोगे तुम,
तेरी आंखों के निशाने समझ नहीं आते।

‘अनिल’ तो रूखा है, रूखा ही रहेगा,
उसे खुशी के फसाने समझ नहीं आते।

 
 

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