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वर्ष: 2, अंक 35,  अप्रैल(द्वितीय) , 2018



यह कैसा जीवणा


कमला घटाऔरा


हमारी दुनिया सिकुड़ कर इतनी पास आ गई है कि हम उसकी हर साँस को महसूस कर सकते हैं । उसके हर कार्य को अपनाने में पीछे नहीं रहना चाहते ।बात नारी की ले तो हम देखते हैं कि पाश्चात्य जगत की नारियाँ जो अपने पैरों पर खड़ी हैं ,अपने लिये रोटी ,कपड़ा और मकान का जुगाड़ करने में सक्षम हैं । विवाह के बाद या बिना विवाह किये माँ बनकर ,एकल पालक बनकर जीवन गाड़ी खींचने की भी सामर्थ्य रखती हैं ,क्योंकि उनके रिश्ते ज्यादा दूर तक साथ निभाने वाले नहीं बनते । तलाक के बाद दूसरे की तलाश में निकल पड़ती हैं ।घर संसार संभाल कर रखने की उन्हें शिक्षा नहीं मिली होती ।बच्चों को पालने में जीवन समर्पित करने की न उनकी संस्कृति है ,न संस्कार है ।जीवन का पूरी तरह आनंद लेना , उसे अपनी इच्छा अनुसार जीना , उसका भोग करना उनके लिये अहम् है ।

हमारी भारतीय नारी भी उसी के नक्शे कदम पर चल पड़ने को कटिबद्ध है ।यह सही है परिवर्तन जीवन में नवीनता लाता है । लेकिन बिना आगा पीछा सोचे किसी की नकल करने से कोई उपलब्धि नहीं मिल सकती । मृतप्राय पड़ी मान्यतायों को गले का श्रृंगार बनाना भी शोभा नहीं दे सकता ।यह भी सच है कि बहुत कुछ नया करने के लिये कुछ अलग अपनाना जरूरी है ।लेकिन अपने मूलभूत संस्कारों का पूरी तरह परित्याग करने से तो हम अपनी पहचान ही खो देंगे । कुछ नया करने या अपनाने से जरूरी है उसके दोनों पहलुयों पर विचार किया जाये ।पाश्चात्य नारी अपनी पूर्ण स्वत्रंतरता का जो भुगतान कर रही है ।वह भी जानना जरूरी होगा । पाश्चात्य नारी को इस स्वत्रंतरता की क्या कीमत चुकानी पड़ती है ।

आइये देखें ।वे कभी डिप्रेशन में जाकर खुद ही अपने बच्चों की हत्या कर बैठती हैं ।या बच्चे को न चाहने वाला पिता ही उन्हें उसकी दुनिया में आने का मृत्यु दंड दे देता है ।कहीं अकेले मॉम या डैड के साथ रहने वाले बच्चे भी पूर्ण प्यार न पाने के कारण डिप्रेशन में चले जाते हैं । जीवन भर एक कमी में जीते हैं । यह कमी उन्हें कहीं उदंड बना देती है ,तो कहीं उन्हें अक्रामक । दुनिया उसे दुश्मन नजर आती है । वे उससे बदला लेने की भावना में जीने लगते हैं । स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ उनकी कभी बनती ही नहीं । या तो वे उन्हें तंग करते हैं या खुद गुमसुम रहने लगते हैं ।

पुरुष पुरुष ही है ।पूर्व का हो या पश्चिम का ।वह नारी को सिर्फ भोग की वस्तु समझता है । पूर्व की नारी अपने संस्कारों परम्पराओं और मर्यादा का ध्यान रखकर पुरुष का हर जुल्म हर यातना सहती आई है । अगर पूर्व की नारी भी पाश्चात्य देशों की नकल में घर परिवार और बच्चों का भविष्य बरवाद करने पर तुल जायें तो परिवार का क्या होगा ? समाज की पहचान क्या रहेगी ? कोई नहीं सोचता । नारी में आये बदलाव से पुरुष डरता है वह उसे अपना गुलाम न समझने लगे । उसकी आजादी पर रोक लगाने के लिये कुड़ कर उसे बदचलन कहने से भी नहीं हिचकिचाता ।तलाक देते भी देर नहीं लगाता ।वह उसे बराबर के स्थान पर देख ही नहीं सकता ।बुढ़ापे में पहुँच कर भी तलाक देने को तत्पर हो जाता है बिना बिचारे जब कि इस वक्त दोनों को एक दूसरे के साथ की बहुत जरूरत होती है ।

दुनिया बदल रही है । पुरुष वहीं का वहीं खड़ा है ।पढ़ने लिखने , काम करने की आज्ञा दे कर जैसे वह समझता है उसने बहुत बड़ा त्याग किया है नारी के लिये ।काम पर जाने वाली नारी पर शर्तों का भार लाद दिया जाता है । वह बाहर काम करके समय पर घर पहुँचे , घर को सहेजे , घर वालों की पेट पूजा का भी प्रबंध करे जैसे यह तो उसी के हिस्से का काम हो ।बाहर पैसे कमाना तो उसका शौक हो । वह इन्सान न हुई कोई मशीन हो गई । नई भाषा में कहे जैसे वह लोहे का रौबोट हो गई हो । जो कभी थकता नहीं लगातार चौबीस घंटों की ड्यूटी बजा सकता है । नारी पहले भी सातों दिन चौबीस घंटे काम करके पति के परिवार की सेवा में बिताती आई है ? उसे क्या हासिल हुआ ? अब बाहर जाकर चार पैसे कमा कर पति की आर्थिक मदद करके भी उसे कुछ हासिल होता नजर नहीं आता । होना तो यह चाहिये पुरुष अपना नजरिया बदले जिस तरह वह बाहर काम करके घर आने पर अपनी सेवा टहल चाहता है ।समय पर आये को चाय नाश्ता और रात के खाने की उम्मीद रखता है ,और किसी को भी यह चाह हो सकती है ? नहीं सोचता ।हाँ कुछ अपवाद भले मिल सकते हैं । इन्सानियत की पीड़ा समझने वाले । औरों को अपने जैसा इन्सान समझने वाले ।

प्राय ऐसा कम ही देखने में आता है । पुरुष वहीं का वहीं है ।ना उसके संस्कार बदले ,न उसने कभी सोचा जब उसकी पत्नि बाहर से थक हार कर घर आती है ।उसे भी वह सब सुविधा चाहिये । जो उसे चाहिये । इस और से तो वह आँख बंद किये बैठा है ।नतीजा यही निकलता है ।जिसने जो सोचना सोच ले ।मुझे मेरी जिन्दगी जीने का मन मर्जी करने का पूरा हक है ।मैं तो ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना जो हूँ ।कौन इसे नकार सकता है ? आज जब नारी भी हर क्षेत्र में उसके सम कक्ष खड़ी है ।वह स्वीकारना ही नहीं चाहता ।पढ़े लिखे वर्ग में भी नारी को परताड़ित करने वाली घटनायें आम सुनने में आ जाती हैं मारने मरवाने की ।बेटा न दे सके तो भी वह पुरूष को स्वीकार नहीं मार कर या घर से निकाल कर ही दम लेता है । पुरूष अपने अहं के इतना अधीन है कि उसे अपने सिवा कुछ नजर नहीं आता ।अन्य बातों की उसे बहुत समझ आ गई है लेकिन नारी को इन्सान समझने की समझ कब सीखेगा ?

क्या किसी के पास कोई उत्तर है ? बेकार होने पर पत्नि की कमाई उसे नशा पानी करने के लिये भी चाहिये । बहू बना कर लाई दूसरे की बेटी को दहेज के लालच में आ लोग कत्ल करने से भी नहीं कतराते ? उसे इतनी मानसिक यातना देते है कि वह पखे से लटक कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने को मजबूर हो जाती है ।उसे इन शारीरिक और मानसिक यातनायों से भरे दुनियावी संबंधो से कैसे मुक्ति मिले ।वर्षो मेहनत करके कमाई उसकी डिगरी की सुसराल वालों के लिये कोई अहमीयत नहीं । धन के लोभी लोग अमानुष्किता दिखाने से गुरेज नहीं करते ।क्या कोई समाज सुधारक , विचार वेत्ता , कोई युग प्रवर्तक , महा मानव क्या इस एक सवाल का पूरी ईमान दारी से उत्तर दे सकता है कि नारी इस दुनिया में क्या गुलाम बन कर जीने ही आई है ? सिर्फ यातना सहने ही आई है ।

“ नहीं ! कभी नहीं ! “कोई दबी जबान से भले कह दे ,”नहीं “ पर उसकी इस ‘नहीं’ में सच्चाई नहीं होती ।आखिर हार कर नारी यही सोचती है यह कैसा जीवन ? नारी समाज की धुरी होने पर भी इतनी उपेक्षनीया क्यों ? हर क्षेत्र में अपनी योग्यता के झँडे गाड़ कर भी उसे सम्मान नहीं दे पाते ।नरभक्षी बन आज का इन्सान उसे नोचने ,जल्लील करने , उसकी इज्जत लूटने की ही ताक में रहता है ।बड़ो की देखा देखी किशोर और युवा वर्ग भी नारी में माँ बहन बेटी की जगह एक भोगने की वस्तु देखता है ।न उसे नारी नजर आती है ना इन्सान ।


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