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वर्ष: 2, अंक 35,  अप्रैल(द्वितीय) , 2018



ममता


राजीव कुमार


शाम में बहुत देर तक घर नहीं लौटने पर कमला अपने बेटे गब्लू के लिए परेशान हो गई। इधर-उधर बहुत आवाज लगाई, ‘‘गब्लू, गब्लू! मगर कहीं भी नहीं मिला तो कमला का कलेजा जोर से धड़कने लगा। पप्पू की मां ने बताया कि गब्लू मेरे घर आज नहीं आया है। कमला ने गब्लू का पता लगाने के लिए मूंगड़े को नदी, खेत और टीले तक दौड़ाया, फिर भी गब्लू का कहीं पता न लगा। अब तो कमला के मन में बुरे-बुरे खयाल आने लगे। आठ वर्ष की उम्र कोई बहुत ज्यादा तो नहीं है, अकेला छोड़ना ही नहीं चाहिए था। गब्लू के पापा को क्या जवाब दूंगी?’’

मूंगड़े को आसपास के घर-घर में ढूंढ़ने के लिए भेजकर कमला बरामदे में बैठकर रोने लगी। उधर गौमाता ने रंभाना शुरू किया तो कमला खीजकर बोली, ‘‘इधर मेरा बेटा भुला गया है और तुमको अपने बछड़े को दूध पिलाने की पड़ी है? न जाने किस हाल में होगा मेरा गब्लू?’’

गाय ने लगातार रंभाना प्रारंभ किया। पांच मिनट तक गाय लगातार रंभाती रही, अंत में कमला को बरदाश्त नहीं हुआ तो गुस्से में आकर कमला लाठी लेकर गौशाला की तरफ चल दी। रंभाते हुए गाय को मारने के लिए कमला ने लाठी उठा ली। उस समय कमला का चेहरा एकदम लाल हो उठा। रोते-रोते आंखें भी लाल हो गई थीं। गाय ने रंभाते हुए कमला का ध्यान सामने पड़ी चारपाई पर खींचा। कमला ने देखा कि मेरा गब्लू, मेरा दुलारा, मेरी आंखों का तारा, चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा है।

कमला बहुत खुश हुई। मगर पश्चात्ताप भी हुआ और गौमाता के गले में बांहें डालकर कहने लगी, ‘‘व्यर्थ ही मैं तुम पर गुस्सा कर रही थी। तुम्हारा रंभाने का संकेत अपने बछड़े को दूध पिलाना नहीं था बल्कि मेरे बच्चे से मिलाना था। माफ कर दो।’’

गाय बेजुबान आंखों से आंसू बहाने लगी तो कमला को अहसास करा रही थी, ‘‘मैं भी तो मां हूं तुम रोज मेरे बछड़े का खयाल रखती हो, मैं नहीं चाहती कि तुम्हारा बेटा तुमसे दूर रहे।’’

कमला ने बछड़ा खोल दिया, बछड़ा अपनी मां का दूध पीने लगा।


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