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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



क्षणिकाएं


सुशील शर्मा



तुमसे जुड़ाव
सुनहरा पड़ाव

कुछ प्रश्न बनते उत्तर।
कुछ उत्तर होते निरुत्तर।

तुम्हे पाने की ललक
आसमान का फलक।

तुम्हे पाना
चांद को छूना।

तुम्हारी यादें
आंसुओं की बुनियादें।

हर हसीं चेहरा
अक्स तेरा।

कब मिलोगे
मन में खिलोगे।

तेरे बिन 
सूनापन।

चांद के पार
तेरा इंतजार।

 
क्षणिकाएं
जल

जल जैसे
सूखते रिश्ते
बंजर संवेदनाएं।

पेड़ों के कातिल
जल संरक्षण पर
व्याख्यान।

जल का सकोरा
ढूंढती चिड़िया
कांक्रीट का
बियावान।

सूखते जल स्त्रोत
फैलता अमानुष
बढ़ती भूख
सिकुड़ता मन।

एक गागर पानी
कुछ मौतें
चीखता टीवी
सोती सरकारें।

जल संरक्षण
सूखा मन
बिकता पानी
मरती गाय
कटते वृक्ष
लुप्त गोरैया
सामाजिक ध्रुवीकरण
अच्छे दिन।

मैली गंगा
सूखती नर्मदा
सोने की रेत
लुटती नदी
सिसकते मानवाधिकार
सिर्फ जुमला
जल बचाओ।

दादाजी की नदी
पिता जी का नल
बेटा की बोतल
आने वाली पीढ़ी
पूछेगी कैसा होता था जल

जंगल पर आरी
सरोकारों पर कटारी
जल पर होगी
लड़ाई सारी।

जल पर कविता
मैंने भी लिखी
सूखते मन को
राहत न मिली

सूख गया
मन का जल
तन का जल
सरोकारों का जल
बहुत विषम है
आने वाला कल।

    

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