Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मेरा गाँव


डॉ०सुधेश


 
    मेरा भी था गाँव
    जहाँ पीपल की छाँव ।
जहाँ पुरखे जिये मरे
कितने तो काज सरे 
जीवन को घोर धूप मेँ 
      थी बूढे बरगद की ठँडी छाँव ।

जिसे बचपन मेँ देखा 
फिर कभी नहीँ झाँका 
किस मुँह से कह दूँ 
   ..छुटे हुए को अपना गाँव ।

दुनिया के देश कयी देखे 
नहीँ अपने देश सरीखे 
दुनिया नाराज भले हो 
    अपने घर मेँ मिलती  है ठाँव ।

हो शहरी महानगर का 
कुछ तो है गँव ई  घर का 
तन पडा नगर जगमग मेँ 
    फिर भी मन है अपने गाँव 
    कभी मेरा भी था गाँव ।

   

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com