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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



खुश रहकर जियो ज़िन्दगी


रश्मि सुमन


 
खुद में एक समन्दर सा 
करीब करीब हर इंसान
कितना कुछ रखे रहता अपने अंदर
एक बार सोच तो लें जरा.....

देखा है मैंने अक्सर ही
टूटे व बिखरे इंसानों को 
कहीं ऐसा तो नहीं कि
कद अपने अपने हुनर का 
गिरा दिया उन्होंने जरा ?

कुछ बनने की फ़िक्र में कम ,
किसी तरह भी बने रहने का मोह छोड़ न पाते हम ,
दूसरों को कमतर आँकना
ऐसा न करके ,देखिये तो जरा....

जो लकीरों में नहीं लिखा
उसे ही किस्मत मान लेते हम 
जो है , वो क्या कम है
ऐसा मान ,खुश रहकर जिया जाये तो जरा.......

   

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