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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



मौन की आवाज


पवनेश ठकुराठी ‘पवन’


 
कभी-कभी बोलना
बोलना नहीं कहलाता
बादलों की गड़गड़ाहट
बिजली की तड़तड़ाहट
नदी की सुसाट-भुभाट
चील कौवांै की कुकाट
सब फीकी पड़ जाती है
कभी कभी मौन की आवाज
भूकंप साबित होती है।


 

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